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Wednesday, 10 December 2014

मोनिका पंत
(21.09.1965 - 30.11.2014)
मैं जीना चाहती हूँ,
अभी कुछ दिन ये प्याला जि़न्दगी का,
मैं पीना चाहती हूँ,
मैं जीना चाहती हूँ,
मगर कुछ हो रहा है जो मुसलसल,
मिरी ख़्वाहिश के आड़े आ रहा है,
मिरी रग रग को तोड़े जा रहा है,
बहुत ही जानलेवा, बहुत ही जानलेवा,
अचानक दर्द की लहरें उमड़कर,
मुझे अंदर ही अंदर काटती हैं,
मैं गिरती जा रही हूँ,
अजब सी खाईयों में,
जहां गहराईयों में,
अंधेरों के सिवा कुछ भी नहीं है,
मिरे अहबाब मुझको,
दिलासा दे रहे हैं
मुझे थामे हुए हैं,
मगर ढारस बंधाने की ये सारी कोशिशें अब, 
किसी भी काम की लगती नहीं हैं,
वो सारे फ़लसफ़े जिन पर अक़ीदा था हमारा
ख़्याली लग रहे हैं,
तसल्ली तक नहीं देते हैं अब तो,
बहुत बेकार साबित हो रहे हैं,
मिरे अंदर छुपा मेरा ख़ुदा भी,
मिरे ही साथ जैसे मर रहा है,
मुझे डर लग रहा है, बहुत डर लग रहा है,
मुझे सब याद आता जा रहा है,
मिरा बचपन, जवानी और सपने,
वो सारे ख़ूबसूरत पल सुनहरे,
वो मेरी मां का आंचल,
वो मेरे घर का आंगन,
मिरे बाबा की गोदी,
मिरी गुडि़या, वो बचपन की सहेली
मिरे स्कूल कालेज के ज़माने,
वो सब मेले तमाशे,
वो सब रंगीन मंज़र,
वो सब ग़मगीन लम्हे,
वो पहले प्यार के दिन,
वो शहनाई, वो डोली,
वो सारी ख़ुश्बुएं ताज़ा हैं अब तक,
ज़हन में आज भी फैली हुई हैं,
कि जैसे कल का ही कि़स्सा हो सारा,
वो नन्हें पांओं जो आंगन में मेरे,
कभी छन छन चले थे,
वो दिन कितने भले थे,
अचानक टीस फिर उठ्ठी बदन में,
अचानक दर्द का हमला हुआ है,
कहीं से रेंगते सायों ने आकर
मुझे फिर ढक लिया है,
हिरासां हो गई हूँ,
फफक कर रो पड़ी हूँ,
मिरी चीख़ों ने मेरे हमनफ़स को
परेशां कर दिया है,
थकन से भर दिया है,
मैं मिटती जा रही हूँ,
मैं कटती जा रही हूँ,
दवाओं पर भरोसा कर रही थी,
दुआओं पर भरोसा कर रही थी,
मगर हर आस झूठी पड़ रही है,
मिरे सारे यक़ीं गिरने लगे हैं
मैं पल पल घुट रही हूँ,
मैं पल पल मर रही हूँ,
बहुत ही जानलेवा दर्द है ये,
कि जिससे मौत अच्छी,
ख़ुदा जाने ख़ुदा है या नहीं है,
न जाने क्या अब इसके बाद होगा?
न जाने अब कहां जाना पड़ेगा?
अजब दहशत सी तारी हो रही है,
मुझे डर लग रहा है,
बहुत डर लग रहा है,
ये इतनी ख़ूबसूरत मेरी दुनिया,
कभी इससे मिरा मिलना न होगा,
ये जिसको जि़न्दगी कहते हैं हम सब,
न जाने दरहक़ीक़त चीज़ क्या है?
ये दुःख तकलीफ़, ये आंसू, ये खुशियां,
कोई जादू है या कोई पहेली,
मगर जो भी है कितना दिलनशीं है,
यहां के सारे रंज ओ ग़म के सदक़े,
वो इक वक़्फ़ा जिसे कहते है हस्ती,
बहुत ही क़ीमती था, बहुत ही क़ीमती है,
मिरा अब होश भी खोने लगा है,
मिरी सांसें उखड़ती जा रही हैं,
बढ़ी जाती है शिद्दत दर्द की अब,
मुझे क्या हो गया है? 
मुझे क्या हो रहा है?
मिरा ये जिस्म रिसता जा रहा है,
पिघलता जा रहा है,
मैं कुछ कहने की कोशिश कर रही हूँ,
मगर नाकाम होकर,
ख़ुद ही में घुट रही हूँ,
मिरी आवाज़ अब रूक सी गई है,
ज़बां लाचार होकर,
लरज़ती जा रही है,
अंधेरा घिर रहा है
सभी कुछ खो रहा है,
मैं झुंझलाहट में अपने हाथ पांव,
पटकना चाहती हूँ,
मगर मजबूर हूँ मैं,
बहुत लाचार हूँ मैं,
मिरा ये जिस्म सुनता ही नहीं है,
कोई भी बात मेरी,
तनाबें सब मिरी कटने लगी हैं,
मिरा सब कुछ उखड़ता जा रहा है,
उजड़ता जा रहा है,
मिरा सारा तमाशा,
मिरे अतराफ़ में साए खड़े हैं,
मिरा मेला उजड़ने को है आखि़र,
मैं शायद मर रही हूँ,
यक़ीनन मर रही हूँ,
मुझे रोना सा फिर आने लगा है,
बहुत घबरा रही हूँ,
मुझे डर लग रहा है
बहुत डर लग रहा है,
अभी कुछ दिन मैं रहना चाहती हूँ,
यहां पर,
मैं जीना चाहती हूँ,
अभी कुछ और दिन तक,
मैं जीना चाहती हूँ..................... मनीष शुक्ल