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Friday, 1 July 2016




जाने  किस  शै  के  तलबगार  हुए  जाते  हैं।

 खेल   ही   खेल   में   बीमार   हुए   जाते   हैं। 

क़ाफ़िला दर्द  का  चेहरे  से  गुज़र  जाता  है ,

ज़ब्त   करते   हैं   तो  इज़हार   हुए  जाते  हैं। 



भला  किसको  यक़ीं आएगा मेरी  बात पर  लेकिन ,

कभी   मैंने  मुजस्सम  चांदनी  को  छू के देखा  था। 


किसी   के  इश्क़  में बरबाद  होना।

 हमें  आया   नहीं   फ़रहाद    होना।

कोई   तामीर की  सूरत तो  निकले ,

हमें    मंज़ूर   है    बुनियाद   होना। 


कितनी उजलत में  मिटा डाला गया।

दफ़अतन  सब कुछ भुला डाला गया। 

हम   चराग़ों  की   मदद   करते   रहे ,

और  उधर  सूरज  बुझा  डाला  गया। 


हमें ख़्वाबों की  दुनिया  तो  मयस्सर  हो  नहीं  पाई ,

मगर ख़्वाबों की दुनिया पर फ़साने लिख रहे हैं हम।


मुख़ालिफ़ीन   को  हैरान  करने  वाला हूँ। 

मैं  अपनी  हार का  ऐलान करने वाला हूँ। 

सुना   है दश्त  में  वहशत  सुकून पाती है ,

सो   अपने  आपको वीरान करने वाला हूँ। 


तुम  अपनी  बात   कहना  जानते हो ,

तुम्हें लफ़्ज़ों   की  आसानी  मुबारक।






  आग हवा और पानी ही   सरमाया था ,

 हद से हद हम लोग धुवाँ हो सकते थे।


 वो  आस्मां    हूँ  कि  मातम  नसीब  है जिसका ,

 सितारे   रोज़   ही   करते  हैं  ख़ुदकुशी   मुझमें। 


कभी कभी कुछ ऐसे दिलकश मंज़र दिखते हैं शब भर,

नींद भी खुल जाये तो आँखें ख़्वाब से लिपटी रहती हैं।


सभी से ऊबकर  यूँ तो  चले  आये हो  ख़ल्वत में ,

मगर ख़ुद से भी उकताने में कितनी देर लगती है?



 तुम्हारा  हौसला  रखने  को   हंस   दिए   वरना ,

तुम्हारी  बात  ने  हमको   सिवा  उदास   किया।


सहर से  शाम रहती  है  यही मुश्किल मिरे आगे

कभी रस्ता  मिरे  आगे कभी  मंज़िल मिरे आगे।



                            कभी  दिल  में  मिरे  तेरे  सिवा  हर  बात  होती  है 

                 कभी  दिल  में  मिरे  तेरे  सिवा  कुछ  भी  नहीं होता।


                 चाँद   सितारे  मुट्ठी  में  थे ,  सूरज  से  याराना   था,

          क्या दिन थे जब ख़्वाब नगर में अपना आना जाना था। 

                 तुझे  मुकम्मल  करना  था  इक  हिस्सा  मेरे क़िस्से का ,
  
           मुझको  तेरे  अफ़साने  में    इक  किरदार  निभाना  था ,



जब  तक  हमारे  नाम से वाक़िफ़ हुआ  जहाँ,

    तब  तक  हमारे  नाम  का  पत्थर उखड़ गया।  

                       
हो गया चीख के खामोश परिंदा लेकिन,

मुद्दतों तक रहीं माहौल  पे तारी चीखें।


यही है ज़िन्दगी  भर  का  असासा,

अगर ये ज़ख्म  भी भरने लगा तो.


अब  हमारे  बीच  दरवाज़ा  नहीं  दीवार  है 

                    और कोई दीवार दस्तक से कभी खुलती नहीं .


जो हर लम्हा बदलता जा रहा है,

यही चेहरा मिरी पहचान है क्या?







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