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Saturday, 4 February 2017

आओ हम तुम दोनों मिलकर दुनिया को ठुकराते हैं। 
बाहर  से  ज़िंदा  रहते  हैं   अंदर   से   मर   जाते   हैं।

जाने  कब  तक  सूरत  निकले  चारागर के आने की ,
तब तक  अपनी  साँसों  से  ही  ज़ंजीरें  पिघलाते  हैं। 

अपनी   मदहोशी   का   आलम  दीवारों  ने  देखा  है ,
हम  अपने  दिल  का पैमाना ख़ल्वत में छलकाते हैं। 

तुझको  कड़वी  लगती   हैं  तो शायद कड़वी ही होंगी ,
हम  तो  बस  तेरी  बातों को ज्यों का त्यों दोहराते हैं। 

दुनिया  वालों  से क्या  चर्चा करते अपने ज़ख़्मों का ,
वो   बातें  करने  से  तो  हम  ख़ुद  से  भी कतराते हैं। 

यूँ  तो तुमको  बरसों पहले हम ने अपना मान लिया ,
फिर  भी  अब  तक नाम तुम्हारा लेने में शरमाते हैं। 

दुनिया  वाले   हँसता   गाता  चेहरा   देखा  करते   हैं ,
उनको  क्या  मालूम  कि हम भी रोते हैं  झुंझलाते हैं। 

हम   से  शायद  छूट  गया  है  सामां  कोई  रस्ते  में ,
रह  रह  कर  क्यूँ  पाओं  हमारे  चलते हैं रुक जाते हैं।

 एक  अकेला  दिल  दुनिया  की सारी बातें एक तरफ़ ,
इक  छोटी   सी  कश्ती  लेकर  तूफ़ां  से  टकराते  हैं। 
मनीष शुक्ला 


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