Follow by Email

Tuesday, 20 June 2017


तुझ   तक  आने  जाने  में  ही टूट गए।
दीवाने    वीराने      में    ही   टूट   गए।

वो    औरों   को  कांधा   देने  वाले   थे ,
अपना   बोझ    उठाने  में  ही  टूट गए।

हम  जो अच्छे फ़नकारों में शामिल थे ,
इक   किरदार  निभाने  में  ही टूट गए।

दुनिया तक फिर जाम भला कैसे लाते ,
मयकश  तो  मैख़ाने  में  ही   टूट   गए।

होंठों तक तो सिर्फ़ तमाज़त ही पहुंची ,
नश्शे   तो   पैमाने   में   ही   टूट   गए।

क्या उनका फिर  हाल तबाही में होता ,
वो  तो   ख़ैर  मनाने  में  ही  टूट   गए।

हमको अपने  साथ  गुज़ारा करना था ,
हम  ख़ुद  को समझाने  में ही टूट गए।
ऊपर   तो  बस  चांदी  सोना ही आया ,
मोती   तो   तहख़ाने  में  ही   टूट  गए।
तुमको  सारी  रात  कहानी कहनी थी ,
तुम  तो   इक अफ़साने में ही टूट गए। 

मनीष शुक्ला 





जब  आसमान  का समझे नहीं इशारा तुम। 
तो फिर ज़मीं को कहाँ रह सके गवारा तुम। 

तुम्हारे    दैर   का  सबसे   हक़ीर   ज़र्रा  हम ,
हमारे  चर्ख़  का  सबसे  हसीं  सितारा   तुम। 

अब  इसके  बाद  हमें  दीद  की नहीं  हाजत ,
नज़र  के  वास्ते  हो  आख़िरी  नज़ारा   तुम। 

बढ़ा  के  क़ुर्बतें  बीमार  कर   दिया   हमको ,
अब  आके  हाल  भी पूछो कभी हमारा तुम। 

तुम्हारी  आग   में  जलते  हुए  सरापा  हम ,
हमारी   राख  से  उठता  हुआ  शरारा  तुम। 

तुम्हारी  बात  पे  हमको  हसीं  सी  आती है ,
हमारा   हाल  न   पूछा  करो  ख़ुदारा   तुम। 

हमारे    साथ  से   तुम  मुत्मईं   नहीं   लगते ,
हमारे  साथ  में  करते  तो  हो  गुज़ारा  तुम। 

मनीष शुक्ला 


किसी को ग़म ने किसी को ख़ुशी ने तोड़ दिया। 
हमें  तो   जिसने  बनाया  उसी  ने   तोड़  दिया। 

हम   भी  बेबाक  तकल्लुम  पे  यक़ीं   रखते  थे ,
हमें   भी  शहर  की   तानाज़नी  ने  तोड़  दिया। 

तिरा   भी  ज़ब्त  मिरे आंसुओं  में  बह  निकला ,
मिरा   भी   सब्र   तिरी   बेबसी   ने   तोड़  दिया। 

जगह    जगह   पे   द रारें   पड़ीं   तकब्बुर   पर ,
मिरी  अना   का क़िला  आशिक़ी ने तोड़  दिया। 

इसी  के  ज़ोम पे  हस्ती  को  दिल्लगी  समझा ,
मिरा   ग़ुरूर   इसी   ज़िन्दगी  ने   तोड़   दिया। 

अबस   शराब   पे  इलज़ाम  रख   रहे  हैं  लोग ,
मिरा   नशा   तो  तिरी  बेरुख़ी  ने  तोड़  दिया। 

मिरे मलाल को अब रो के और सिवा  मत कर ,
मिरा   भरम  तो  तिरी इक हंसी ने तोड़ दिया।
हुदूद  ए  ज़ीस्त  से  बाहर  निकल  गए प्यासे ,
तलब   का  दाएरा  तिशनालबी  ने तोड़ दिया। 

अब अपना ध्यान किसी चीज़ में नहीं लगता ,
हमारा  ध्यान तो कबका किसी ने तोड़ दिया। 
मनीष शुक्ला  


एक तो इश्क़ ख़ुद मुसीबत है।
उसपे हमको वफ़ा की आदत है।

अब भी ख्वाबों में उसका आ जाना ,
जाने किस बात की अलामत है।

आपके तेवरों से है ज़ाहिर ,
आपकी आपसे अदावत है।

आह भरते हैं चीख़ लेते हैं,
आजकल दर्द की इनायत है।




वक़्त    पैग़ाम    का    नहीं   शायद। 
अब   मरज़   नाम  का  नहीं  शायद। 

इसका चाहा  न कुछ हुआ अब तक ,
दिल   किसी  काम  का नहीं शायद। 

अब    सहीफ़े    ज़मीं   से   उगते  हैं ,
 दौर    इल्हाम    का   नहीं    शायद। 

  उतरा   उतरा ,   सियाह  , अफ़सुर्दा  ,
 रंग    ये   शाम   का    नहीं    शायद। 

 ख़ामुशी      की     तनाब    टूटी    है ,
शोर   कुहराम    का   नहीं   शायद। 

इश्क़     करना    तबाह   हो   जाना ,
काम     ईनाम    का   नहीं   शायद। 

मनीष शुक्ला 


 आख़िरी  बयानों  में   और न  पेशख़्वानी  में। 
 हम   कहीं  नहीं   आते  आपकी कहानी   में। 

  हम  तमाम   रस्ते   पर  बारहा  मिले  लेकिन 
   देख    ही    नहीं   पाए   आप   बदगुमानी  में। 

  इख़्तिलाफ़   किरनों   का  ऊपरी दिखावा था ,
  एक   हो    गए   सारे   रंग   गहरे   पानी   में। 

    इनसे   तुम  अकेले   में गुफ़्तगू  किया करना ,
     लफ़्ज़   देके  जाएंगे   हम   तुम्हें  निशानी  में। 

  आज    वो   परीचेहरा  बात   कर गया हमसे,
    नाम  तक  नहीं  पूछा  हमने   शादमानी   में। 

    एक  दफ़ा   गए तो  फिर लौट कर  नहीं आये ,
     चूक   हो  गयी   हमसे   अपनी  मेज़बानी  में। 

     तुम  ज़रा  से   ज़ख़्मों  से तिलमिलाए बैठे  हो ,
   सर  कटाए   बैठे    हैं   लोग   हक़बयानी  में। 

मनीष शुक्ला 


जब  आफ़ताब  मिरी  धज्जियाँ   उड़ा  देगा। 
तब   आके  चाँद   मुझे   चांदनी   उढ़ा  देगा। 

मैं  फिर ज़मीं की नसीहत को  भूल जाऊँगा ,
हवा  के  दोश  पे मुझको  वो फिर चढ़ा देगा। 

मैं   रो    के  और   उसे   मुतमईन  कर  दूंगा ,
वो   हंसके   और  मिरे  दर्द   को   बढ़ा  देगा। 

 ये  जो  वजूद  के धब्बे  हैं  इनका  क्या  होगा ?
रिदा   के   दाग़  तो   माना  कोई  छुड़ा   देगा।
 अजीब   ढंग  से  करता  है  रू  ब  रू  मुझको ,
ये   आईना   तो  मुझे  ख़ुद  से  ही  लड़ा देगा।
  फिर   उसके   बाद  उसी  की  ज़ुबाँ में  बोलोगे ,
 वो   चंद    रोज़  में   सारे   सबक़   पढ़ा   देगा। 

ज़ुबाँ  को   बींध  के   रख  देगा   एक  लम्हे में ,
नज़र  का  तीर  वो   चेहरे  पे  जब  गड़ा  देगा। 
मनीष शुक्ला 


Monday, 19 June 2017



 ज़िन्दगी   से    प्यार  कर  बैठे  थे  हम। 
हाँ   कभी   इक़रार  कर  बैठे  थे  हम। 

 फिर  सफ़र  की  शोख़ियां  जाती  रहीं ,
रास्ता   हमवार    कर    बैठे   थे   हम। 

बेझिझक    इक़रार   करना   था  जहाँ ,
बेसबब   इन्कार   कर   बैठे    थे   हम। 

जिस्म   की    ही   पुरसिशें  करते   रहे ,
रूह    को   बेकार   कर  बैठे   थे  हम। 

बरकतें    जाती       रहीं    ताबीर   की ,
ख़्वाब   को   बाज़ार   कर  बैठे थे  हम। 

फिर   हमारा  दिन  बहुत  बरहम  रहा ,
रात  को   बेज़ार   कर    बैठे   थे   हम। 

 हम  को जन्नत  से  निकाला  क्यूँ  गया ?
इश्क़   का   इज़हार  कर  बैठे  थे  हम। 
मनीष शुक्ला 


हमने  अपने  ग़म  को दोहराया नहीं। 
वो   पुराना   राग   फिर   गाया  नहीं। 

जिसको   पाने   की   दुआ  करते  रहे ,
वो    मिला  भी  तो   उसे  पाया  नहीं। 

 ये  तो  है उससे  बिछड़कर  फिर कभी ,
 दिल  किसी  पत्थर  से  टकराया  नहीं। 

इक  दफ़ा  आये  थे  हम  भी  होश  में ,
फिर  कभी  वैसा   नशा   छाया   नहीं। 

चारागर  की  क्या  कहें   हमने   कभी ,
ख़ुद को अपना ज़ख़्म दिखलाया नहीं। 

आज   कितनी   मुद्दतों  के  बाद  फिर ,
दिल   अकेले  में   भी  घबराया   नहीं। 

जिस्म  की  सरहद  से बाहर  आ  गई  ,
अब  मुहब्बत    पर  कोई  साया   नहीं। 

मनीष शुक्ला 


ख़यालों  का  फ़लक  अहसास  के  तारों से  मढ़ने में।
रहे  मसरूफ़  हम कुछ मुश्तबह अलफ़ाज़ गढ़ने  में।

हमें कुछ और  करने की तो मुहलत ही  न मिल पाई ,
हुआ  ज़ाया   हमारा  वक़्त  बस  मिलने  बिछड़ने में।

कहीं  बरसों  में  जाके  खेल  का  सामान  जुट पाया ,
मगर इक  पल लगा अच्छा भला मजमा उखड़ने  में।

कोई   लम्हा  नहीं   ऐसा  कि  जो  हाथों  में आया हो ,
गई   है    उम्र   सारी  उम्र  की  तितली   पकड़ने   में।

 हम  अपने   जुर्म  का  इक़बाल  तो  वैसे  भी कर लेते ,
अबस  जल्दी   दिखाई   यार   ने   इल्ज़ाम  मढ़ने  में।

कहीं आख़िर में  जाके  इश्क़ का मतलब समझ  पाए ,
लगी   इक  उम्र  हमको  आशिक़ी  का  दर्स  पढ़ने में।

उजड़ने  का  बहुत अफ़सोस  है  लेकिन सितम ये  है ,
तुम्हारा   हाथ  शामिल  था  मिरी  दुनिया  उजड़ने में।

हवस  बचती   है  सर  पर  इश्क़  का इलज़ाम लेने से ,
मुहब्बत   उफ़   नहीं  करती  मगर   सूली  पे  चढ़ने में।
किसे  दरिया  की  हाजत  है , किसे  सैराब  होना  है ?
मज़ा    आने    लगा   अब  रेत  पर   एड़ी   रगड़ने  में।

मनीष शुक्ला






अपने   होने   की  तलब  करते   हैं  हम।
क़ैद   ए   हस्ती  मुन्तख़ब करते  हैं हम।

  जाने   क्यूँ   अक्सर   ये  लगता  है  हमें ,
काम     सारे    बेसबब   करते  हैं   हम।

 ज़िन्दगी   को  आज   तक समझे  नहीं ,
 अब तलक नाम ओ  नसब करते हैं हम।

   आरज़ू    हमको    तबस्सुम   की   मगर ,
   आंसुओं   का   भी  अदब   करते  हैं  हम।

  जिन  ज़मीनों   पर  कोई   चलता  नहीं ,
   उन  ज़मीनों  पर   ग़ज़ब  करते  हैं  हम।

  क्या  हुआ?,  होगा , हुआ  जाता है क्या,
   इसकी  कुछ परवा  ही कब करते हैं हम।

   लोग    हैरानी    से     तकते     हैं    हमें ,
  काम   ही   ऐसे   अजब  करते   हैं  हम।

मनीष शुक्ला 




जीने   से    इंकार    किया   जाता   है    क्या ?
 ख़ुद   से  इतना   प्यार  किया  जाता है  क्या ?

 नक़्शतराशी    की  काविश   तस्लीम   मगर ,
 ख़ुद   को  यूँ  मिस्मार  किया  जाता  है क्या ?

 एक    मुकम्मल      दश्तनवर्दी    काफ़ी    है ,
कार  ए  जुनूँ   हर  बार  किया जाता है क्या ?

 इश्क़   मरज़ अच्छा तो  है  लेकिन ख़ुद  को ,
 इस   दरजा   बीमार  किया  जाता  है  क्या ?

 चाहत    का    इज़हार   ज़रूरी    है  फिर भी ,
  चाहत    का  इज़हार  किया  जाता  है  क्या ?

  आग  का  दरिया  आग  का दरिया  होता  है ,
    आग  का  दरिया   पार  किया  जाता है क्या ?

  लहजे    में   कुछ  धार   ज़रूरी   है   लेकिन ,
    लहजे   को   तलवार   किया  जाता  है  क्या ?

     जिस   लम्हे  से   सदियों  की  तौफ़ीक़  मिले ,
     वो   लम्हा  बेकार    किया   जाता   है   क्या ?

     दुनिया    है   दरअस्ल    सराबों    का   मेला ,
     मेले   को   घर बार  किया   जाता   है   क्या ?
मनीष शुक्ला 


جینے  سے  انکار  کیا  جاتا  ہے  کیا ؟
خود  سے  اتنا  پیار  کیا  جاتا ہے کیا ؟

نقش  تراشی  کی    کاوش  تسلیم  مگر
خود  کو  یوں  مسمار  کیا جاتا ہے کیا ؟

ایک   دفع  کی  دشت  نوردی  کافی ہے
کار  جنوں  ہر  بار  کیا  جاتا  ہے  کیا ؟

عشق  مرض اچھا تو ہے لیکن خود کو
اس  درجہ  بیمار   کیا   جاتا  ہے  کیا ؟

چاہت   کا  اظہار  ضروری  ہے پھر بھی 
چاہت  کا   اظہار   کیا   جاتا   ہے   کیا ؟

آگ  کا  دریا    آگ   کا   دریا  ہوتا  ہے
آگ  کا  دریا  پار   کیا   جاتا  ہے   کیا ؟

لہجے میں کچھ دھار ضروری ہے لیکن
لہجے   کو  تلوار   کیا   جاتا  ہے  کیا ؟

جس لمحے سے صدیوں کی توفیق ملے 
وہ  لمحہ   بیکار   کیا   جاتا   ہے  کیا ؟

دنیا   ہے  در  اصل   سرابوں   کا  میلا
میلے  کو  گھر  بار  کیا  جاتا  ہے  کیا ؟
منیش شکلا


Saturday, 17 June 2017



जुर्म   का    इन्किशाफ़  करना  है। 
अब     हमें    ऐतराफ़   करना   है। 

हमको   हर  पल   गुनाह  करने हैं ,
तुझको  हर  पल मुआफ़ करना है। 

एक   गिरदाब   की  तरह   हमको ,
ख़ुद का  कब तक तवाफ़ करना है। 

जंग  लड़नी  है  अपनी  हस्ती  से ,
ख़ुद को ख़ुद के ख़िलाफ़ करना है। 

हक़बयानी   से   काम    लेना   है ,
सारा  क़िस्सा  ही साफ़  करना है। 

मान  जाना  है  हमको आखिर में ,
बेसबब     इख़्तेलाफ़   करना   है। 

इन   चटानों  में  दर   खुले   कोई ,
इतना   गहरा  शिगाफ़  करना  है। 
मनीष शुक्ला 






माज़ी  में  खुलने  वाले  हर  बाब  से  लिपटी  रहती हैं। 
जाने  वालों  की  यादें  असबाब(असवाब )  से  लिपटी   रहती हैं। 

अहल ए सफ़र तो गुम हो जाते हैं दरिया की लहरों  में ,
कश्ती  की  टूटी  बाहें  गिरदाब  से  लिपटी  रहती   हैं। 

कभी कभी कुछ ऐसे दिलकश मंज़र दिखते हैं शब् भर ,
नींद  भी खुल जाए तो आँखें  ख़्वाब से लिपटी रहती हैं। 

तर्क ए तअल्लुक़ ख़त्म नहीं कर पाता है अहसासों को ,
रिश्तों  की  टूटी  कड़ियाँ  अहबाब  से लिपटी  रहती हैं। 

तूफ़ानों   का  ज़ोर  बहा  ले  जाता  है   बुनियादों   को ,
रेज़ा   रेज़ा   तामीरें    सैलाब   से   लिपटी   रहती   हैं। 

उजड़े    घर  की  वीरानी  का सोग मनाने  की ख़ातिर ,
ख़स्ता  छत  की  शहतीरें  मेहराब  से लिपटी रहती हैं। 

उसको  दिन भर तकते तकते डूब तो जाता है लेकिन। 
सूरज  की  बुझती  नज़रें  महताब से लिपटी  रहती हैं। 
मनीष शुक्ला 


हर   मंज़र   का   मोल   चुकाना  पड़ता   है। 
आँखों   को   इक  दिन  पथराना  पड़ता  है। 

मंज़िल   तक  सब   दश्तज़दा  हो  जाते  हैं ,
रस्ते     में     इतना    वीराना    पड़ता    है। 

जो    बातें    लाहासिल   ठहरीं   पहले  भी ,
उन    बातों    को   ही   दोहराना  पड़ता  है। 

ख़्वाहिश  है अपना क़िस्सा लिख दें लेकिन ,
बीच   में    तेरा   भी   अफ़साना    पड़ता है। 

झूठ   के   अपने   ख़मियाज़े   तो   होते   हैं ,
लेकिन    सच   पर   भी  जुर्माना  पड़ता  है। 

गिरवीदा    होना   पड़ता    है   हर   शै   पर ,
फिर   हर   इक  शै   से  कतराना पड़ता  है। 

बस्ती   हम    में    सन्नाटे   भर   देती   है ,
सहरा   सहरा   शोर   मचाना   पड़ता     है। 

मनीष शुक्ला 


जाने  किस  रंग  ने  लिखा है मुझे। 
हर   कोई   साफ़   देखता  है  मुझे। 

कोई    बैठा     हुआ    सितारों   में ,
अर्श   की  सिम्त  खेंचता  है मुझे। 

तेरे   होंठों  पे  क्यूँ    नहीं   आता ?
तेरे   चेहरे  पे  जो  दिखा  है  मुझे। 

मैं  जिसे   रास्ता    दिखाता   था ,
ताक़  पर वो ही रख गया है मुझे। 

मैंने   उस   पार   झांकना   चाहा ,
आसमां  साथ   ले  गिरा  है  मुझे। 

मैंने  आँखें  निचोड़   कर  रख  दीं ,
अब  कहाँ  ख़्वाब  सूझता है मुझे। 

हर   सहर     तीरगी   लिए   आए ,
जाने किस शब् की बद्दुआ है मुझे। 

मेरा   सारा   बदन   पसीज   गया ,
भीगी  नज़रों से  क्यूँ छुआ है मुझे। 

एक   चेहरा  ही  हो  गया  मुबहम ,
और  सब  कुछ  तो याद सा है मुझे 

मनीष शुक्ला 


उसने  मुमकिन   है  आज़माया हो। 
वो     बहाने    से    लड़खड़ाया   हो। 

हो   भी  सकता  है  भीड़  में  इतनी ,
वो   मुझे    देख   ही   न  पाया   हो। 

नींद    टूटी   हो  ये  भी मुमकिन है ,
हो   भी  सकता है  ख़्वाब आया हो। 

क्यूँ किसी ग़म को मैं करूँ रुख़सत ,
एक  आँसू   भी   क्यूँ   पराया   हो।  

काश   वो   जंगलों   में  भटका  हो ,
और   रस्ता   न   भूल   पाया    हो। 

अब   कोई   फ़र्क़   ही  नहीं  पड़ता ,
धूप   बरसे   कि   सर  पे साया हो। 

तब   चमक  देख  सब्ज़ाज़ारों  की ,
दश्त   जब  धूप   में   नहाया    हो। 
मनीष शुक्ला 

Friday, 16 June 2017


مضمھل  روشنی کا کیا کرتے؟
کچھ دے تیرگی کا کیا کرتے؟

ہمکو دیوانگی کی حاجت تھی
ہم بھلا آگاہی کا کیا کرتے؟

عشق کا حوصلہ تو تھا دل میں
پر تری بےرخی  کا کیا کرتے ؟

ہمکو دریا ہی کب فراہم تھے؟
ہم بھلا تشنگی کا کیا کرتے؟

گر تری آرزو نہ کی ہوتی
تو بتا زندگی کا کیا کرتے؟

   پیاس اپنی قبول تھی لیکن
اسکی تشنلابی کا کیا کرتے ؟

بس کہ کٹتے رہے خموشی سے
یہ کنارے ندی کا کیا کرتے؟

جرّت عاشقی بجا لیکن
غیرت عاشقی کا کیا کرتے؟

سر جھکانے میں نفع تھا لیکن
فطرت سرکشی کا کیا کرتے؟

منش شکلا

رات کی بےبسی کا کیا کرتے؟

نور کی کمسنی کا کیا کرتے؟

 رات کی دشمنی کا کیا کرتے؟

رات کی بے دلی  کا کیا کرتے؟






Monday, 12 June 2017



क्या  उसने   कहा  होगा क्या तुमने सुना होगा। 
इस  बार   भी  क़िस्सागो  मायूस  हुआ   होगा। 

कैसा  भी  फ़साना हो  आख़िर तो  फ़साना था ,
कुछ   भूल   गए  होगे  कुछ  याद  रहा   होगा। 

इस  बार भी उजलत  में तुम हमसे  गुज़र आये ,
जो   बाब  ज़रूरी  था  उसे  छोड़  दिया  होगा। 

इस  बार भी  मंज़िल पर  इक टीस  उठी होगी ,
इस  बार  भी   रस्ते  ने  खुशबाश  कहा  होगा। 

 दुनिया  के  मसाएल तो  सुलझे  हैं  न सुलझेंगे ,
 हम  जान  गए   तुमसे  वादा   न  वफ़ा   होगा। 

  गर    ज़ख़्म  कुरेदोगे   कुछ   हाथ   न  आएगा ,
 हम   भूल  चुके  जिसको  वो  दर्द  सिवा  होगा। 

   हम  लोग  बज़ाहिर  तो  सर  ता  पा सलामत हैं ,
  मुमकिन  है  कि  अंदर  से  कुछ टूट गया होगा। 

  इस   बार  भी  मिलने  पर  ख़ामोश  रहेंगे  हम ,
इस  बार  भी रुख़सत पर इक शोर बपा  होगा। 

  इस   बार  भी  सीने  में  हर   बात   छुपा  लेंगे ,
इस  बार भी होंठों पर इक लफ़्ज़ ए दुआ होगा। 
मनीष शुक्ला 







ग़म   ख़ुशी  अच्छा  बुरा  सब ठीक था। 
ज़िन्दगी   में  जो  हुआ  सब  ठीक  था। 

 आज    वीराने    में   आकर   ये   लगा ,
शोर ओ ग़ुल मौज ए बला सब ठीक था। 

  ज़िन्दगी   जैसी   भी   थी   अच्छी  रही ,
बेसबब  जो  कुछ  किया  सब ठीक था। 

 अब   ख़ला   में  आके   अंदाज़ा   हुआ ,
 आंधियां  बाद  ए  सबा  सब  ठीक  था। 

  अब  कहानी  से  निकल  कर  ये  लगा ,
  इब्तेदा   ता   इन्तेहा   सब   ठीक   था। 

   वो   सफ़ीना  ,  वो समन्दर   , वो  हवा ,
  वो    उबरना   डूबना   सब   ठीक   था। 

    कम   से  कम  साथी  मयस्सर था कोई ,
   बेवफ़ा    या   बावफ़ा   सब   ठीक  था। 
मनीष शुक्ला 



काम     बेकार    के   किये   होते। 
काश   हम   ठीक  से   जिए  होते। 

रक़्स    करते    ख़राबहाली    पर ,
  अश्क   ए ग़म   झूम कर पिए होते। 

 दर्द   नाक़ाबिल    ए   मुदावा   था ,
 हाँ   मगर   ज़ख्म  तो  सिए  होते। 

 दर  हक़ीक़त तो ख़्वाब थी दुनिया ,
 हम  भी  ख़्वाबों  में जी  लिए होते। 

एक  ख़्वाहिश ही रह गयी दिल में ,
 हम   तिरे   ताक़    के  दिए   होते। 

  तू    न  होता  तो  इस   ख़राबे  में ,
 सब   के   होंठों  पे  मरसिए  होते। 

बज़्म   अपने    उरूज   पर  होती ,
और  हम  उठ  के  चल  दिए होते। 

नामुकम्मल   रही   ग़ज़ल   अपनी ,
काश  कुछ   और  क़ाफ़िए   होते। 



Sunday, 11 June 2017



ہر کسی کے سامنے تشنہ لبی کھلتی نہیں
اک سمندر کے سوا سب سے ندی کھلتی نہیں

خود نمائی کے لئے اک آئینہ بھی چاہیے
جھیل پر پڑنے سے پہلے چاندنی کھلتی نہیں







घबराकर   अफ़लाक  की  दहशतगर्दी  से। 
हमने  ख़ुद   को  तोड़   दिया   बेदर्दी  से। 

हमने   ख़ुद   ये  हाल   बनाया  है  अपना ,
हमसे   बातें    मत    करिये   हमदर्दी  से। 

जब  ख़ुद को हर  तौर बयाबां  कर  डाला ,
तब  जाकर   बाज़   आये   दश्तनवर्दी  से। 

अब  भी  क्या  कुछ कहने की गुंजाईश  है ?
सब  कुछ  ज़ाहिर  है  चेहरे  की  ज़र्दी  से। 

तुम आकर कुछ वक़्त की गर्माहट भर दो ,
लम्हे    काँप   रहे    हैं    देखो   सर्दी   से। 

हम  इक  बार  भटक कर इतना भटके  हैं ,
अब   तक    डरते    हैं    आवारागर्दी    से। 

हम  भी  इश्क़  की  पगडण्डी  से गुज़रे  हैं ,
वाक़िफ़  हैं  पेच  ओ  ख़म  की  सरदर्दी से। 
मनीष शुक्ला