Tuesday, 13 September 2011

khud ko itna khwar n kar





ख़ुद को इतना ख्वार न कर
समझौता  हर  बार   न कर

ग़म  का  कारोबार न  कर
जज़्बों  को  बेकार  न  कर

अपनों   की    रुसवाई   है
ख़ुद को यूँ अख़बार न कर

रिश्तों में भी  सूद ओ ज़ियाँ
घर को  तू  बाज़ार  न कर

ख़ुदगर्ज़ी    आ     जाएगी
ख़ुद से इतना  प्यार  न कर

तेरे   दिल   में  ख़दशा   है
अब तू  दरिया  पार  न कर

सर पर  भी गिर सकता  है
हर बुत को  मिस्मार न कर

लफ़्ज़ों  का मफ़हूम  समझ
लहजे  पर  तकरार  न  कर
मनीष शुक्ल

Monday, 12 September 2011

faqeerana tabeeyat thi




फ़कीराना  तबीयत  थी बहुत बेबाक लहजा  था
कभी मुझमें भी हँसता खेलता इक शख्स रहता था

बगूले  ही  बगूले  हैं  मिरी   वीरान  आँखों  में
कभी इन रेगज़ारों में कोई दरिया  भी बहता था

तुझे  जब देखता हूँ तो ख़ुद अपनी याद आती है
मिरा  अंदाज़  हंसने का  कभी तेरे ही  जैसा था

कभी  परवाज़ पर मेरी  हज़ारों  दिल  धड़कते  थे
दुआ करता था कोई तो कोई ख़ुशबाश कहता था

कभी ऐसे ही  छाईं थीं गुलाबी बदलियाँ मुझ  पर
कभी फूलों की सुहबत से मिरा दामन भी महका था

मैं था जब कारवां के साथ तो गुलज़ार थी दुनिया
मगर तन्हा हुआ तो हर तरफ़ सहरा ही सहरा था

बस इतना याद है सोया था इक उम्मीद सी लेकर
लहू  से  भर  गयीं  आंखें न जाने ख़्वाब कैसा था
मनीष शुक्ल

gaye mausam ka dar bandhe hue hai




गए   मौसम   का   डर  बांधे   हुए   है
परिंदा   अब    भी   पर   बांधे  हुए   है



बुलाती   हैं    चमकती     शाह    राहें
मगर    कच्ची    डगर  बांधे   हुए    है



मुहब्बत की कशिश भी क्या कशिश है
समंदर   को    क़मर   बांधे    हुए    है



बिखर  जाता  कभी  का  मैं  खला   में
दुआओं  का    असर   बांधे   हुए    है



चला    जाऊं    जुनूं   के   जंगलों   में
ये   रिश्तों    का   नगर  बांधे  हुए  है


हक़ीक़त   का   पता    कैसे    चलेगा
नज़ारा   ही   नज़र    बांधे   हुए    है


गए   लम्हों  की  इक   ज़ंजीर   या  रब
मिरे   शाम  ओ   सहर  बांधे   हुए  है

मनीष शुक्ल

Thursday, 8 September 2011

gade murde ukhade ja rahe hai'n




गड़े    मुर्दे   उखाड़े    जा   रहे  हैं। 
तनावर  जिस्म   गाड़े  जा  रहे  हैं। 

यक़ीनन   कोई   वीराना   सजेगा,
घरौंदे  फिर  उजाड़े   जा  रहे   हैं। 

तुम्हें  बदनाम   हम   होने  न  देंगे.
हर  इक  तहरीर फाड़े  जा रहे  हैं,

बहुत  रोओगे  हमको  याद करके.
तुम्हें   इतना   बिगाड़े   जा   रहे  हैं,

खिजां की उम्र भी आने को है अब.
चले  आओ  कि  जाड़े  जा  रहे  हैं,
मनीष शुक्ल

Tuesday, 6 September 2011

naye manzar sarabon ke

नए   मंज़र  सराबों  के  मिरी आँखों  में भर  देना
अगर मंजिल  नज़र आये  मुझे  गुमराह कर देना,

मुझे ये कशमकश ये शोर ओ ग़ुल  सैराब करते हैं
मिरी कश्ती को दरिया और दरिया को भंवर देना,

मिरी   आवारगी  ही   मेरे  होने   की  अलामत  है
मुझे  फिर इस सफ़र के बाद भी कोई सफ़र देना,

मिरी परवाज़  की  हसरत  यक़ीनन  ज़ोर  मारेगी
अगर उड़ने लगूं तो  मेरे बाल ओ  पर क़तर  देना,

सुना  है   दश्त  में  आगे  बहुत   तारीक  है  रस्ता
मिरे   रख़्त ए सफ़र  में चाँद  या ख़ुर्शीद धर  देना,

बुझा  देना   ज़रा पहले   दिया मेरी  समाअत  का
कभी  मेरी  रिहाई की  मुझे  जब  तुम ख़बर देना,

जुदा करना मिरे इस ख़्वाब से तुम दफ़अतन मुझको
जुदाई  की   मुझे  घड़ियाँ  ख़ुदाया  मुख़्तसर   देना,
मनीष शुक्ल

har ik chehra bahut sehma hua hai




हर  इक चेहरा बहुत सहमा हुआ  है। 
तिरी बस्ती को आख़िर क्या हुआ है ?

बहुत     ग़मगीन    लौटें     हैं    परिंदे,
फ़लक पर आज क्या   ऐसा  हुआ है। 

ज़रा   सोचो    कोई   तो   बात   होगी
कोई   रस्ते  पे   क्यूं   बैठा   हुआ   है,

सुना   है    रात    पूरे   चाँद   की   है,
समंदर  शाम  से  बहका   हुआ   है। 

कभी  ठहरी  थी   थोड़ी  देर  ख़ुश्बू ,
  शजर  उस  रोज़ से  महका हुआ  है। 

मिरे  दिल  में   कोई   मासूम   बच्चा,
किसी  से  आज तक रूठा हुआ है। 

ग़ज़ल  कहकर  सिसकता  है अकेले
कोई  तक़दीर   का  मारा  हुआ   है। 
मनीष शुक्ल

hamei'n kuchh gardish e ayyam se

हमें कुछ गर्दिश ए अय्याम से शिकवा नहीं है
मगर ये भी हकीकत है कि जी अच्छा नहीं है,

बहुत अच्छा हुआ एहसास अब मरने लगे हैं
हज़ारों ज़ख्म हैं लेकिन कोई दुखता नहीं है,

भला किसको दिखाएं जा के दिल के आबले हम
सभी जल्दी में हैं कोई ज़रा रुकता नहीं है,

सभी ने तल्खियों की गर्द इस चेहरे पे मल दी
और उसपर ये शिकायत भी कि अब हँसता नहीं है,

न परियां हैं, न शहज़ादा न लम्बी नींद इसमें
हमारी आपबीती है कोई क़िस्सा नहीं है,

अबस शहर ए बयाबां में ये बातें छेड़ बैठे
यहाँ दिल की कहानी अब कोई सुनता नहीं है,

बहुत ही जानलेवा है ये हस्ती का मुअम्मा
निकल जाने का भी लेकिन कोई रस्ता नहीं है,

सुना करते थे रो रोकर गुज़र जाती हैं रातें
मगर इस रात का कोई सिरा दिखता नहीं है,
मनीष शुक्ल
delete Sep 5 (23 hours ago)

manish:


                                           दिल का  सारा दर्द भरा तस्वीरों  में

                एक मुसव्विर नक़्श  हुआ तस्वीरों में

              चंद  लकीरें  तो  इस दर्जा गहरी थीं
             देखने  वाला  डूब  गया तस्वीरों में

              एक अजब सा जादू बिखरा रंगों का
                 सबको अपना अक्स दिखा तस्वीरों में

               एक  पुराने  ज़ख़्म  के  टाँके  टूट गए
              एक  पुराना   दर्द  मिला  तस्वीरों में

             भूली  बिसरी  यादों  के मंज़र चमके
                 माज़ी  का  इक  बाब खुला तस्वीरों में

             हर  चेहरे  के  पीछे  सौ  चेहरे  उभरे
               सबका  पर्दा  फ़ाश   हुआ  तस्वीरों में

             वक़्त  कहाँ  मुट्ठी  में  आने  वाला था
             लेकिन  हमने बांध लिया  तस्वीरों में

             बात  ज़बां  पर  लाने की पाबन्दी थी
               हमने सब कुछ दर्ज किया तस्वीरों में

            देख  सकेगा  कौन  बनाने वाले  को 
             सबका सारा  ध्यान लगा  तस्वीरों में
मनीष शुक्ल