Thursday, 28 June 2018




इतना ज़ियादा ज़िंदा रहना ठीक है क्या।
हरदम यूँ ताबिन्दा रहना ठीक है क्या।

जो   होता  है   होते   रहने  देते  हो ,
क़िस्मत का कारिंदा रहना ठीक है क्या।

क्यूँ बेकार में दर्ज किया अपना क़िस्सा ,
दुनिया में आईन्दा रहना ठीक है क्या।

कितने सारे जंगल रहते हैं हम में ,
बस्ती का बाशिंदा रहना ठीक है क्या

हम मिटटी के पुतले फ़ानी  होते हैं ,
हम सब का पाईन्दा  रहना ठीक है क्या।

हर्फ़ ओ मआनी मिल कर शोर मचाते हैं ,
लफ़्ज़ों का साज़िन्दा रहना ठीक है क्या।

जो कुछ कर सकते थे कर के देखा था ,
हार के यूँ शर्मिंदा रहना ठीक है क्या।

फिर सब मस्ती का कारन भी पूछेंगे ,
हर लम्हा रक़्सिंदा रहना ठीक है क्या।

चाँद सितारे फीके लगने लगते हैं ,
इस दर्जा रख़शंदा रहना ठीक है क्या।
 


Wednesday, 27 June 2018



कैसा हंगाम उठाया था कभी।
ख़ुद को जी जान से चाहा था कभी।

ख़ामुशी चीख उठी थी डरकर ,
हमने वो शोर मचाया था कभी।

हम भी हंस हंस के मिले थे सब से ,
हमने भी सोग मनाया था कभी।

वो ही मालिक है हमारा देखो ,
जिसको मेहमान बनाया  कभी।

हमको आता है बिछड़ने का हुनर,
हमने भी साथ निभाया था कभी।

हमने हर बात बता दी सबको ,
हमने हर दाग़ छुपाया था कभी। 


तुझसे मिलने का इरादा तो नहीं करते हैं।
फिर भी मिलने पे किनारा तो नहीं करते हैं।

तुझसे मिलने तिरी महफ़िल में चले आते हैं ,
तुझसे उल्फ़त का तक़ाज़ा तो नहीं करते हैं।

सच बता यार कि हम तेरा सहारा बनकर ,
तेरी लग़ज़िश में इज़ाफ़ा तो नहीं करते हैं।

हम को तस्लीम किया जाता है मजबूरी में ,
हमको सब लोग गवारा तो नहीं करते हैं।

बस तिरा नाम लिया करते हैं दिल ही दिल में ,
तुझको हर वक़्त पुकारा तो नहीं करते हैं।

कुछ तो कहते हैं चमक कर ये सितारे हमसे ,
हमसे मिलने का इशारा तो नहीं करते हैं।

ख़ुद से  हर बात छुपाते  तो नहीं हैं फिर भी ,
ख़ुद को  हर बात बताया तो नहीं करते हैं।





तिरे होंठों में अपनी तिश्नगी बोते रहे पैहम।
तिरे ज़रिये हम अपने आप के होते रहे पैहम।

तुझे पाना भी इस दर्जा फ़रहत आमेज़ है हमदम ,
तुझे पाकर भी हर दफ़आ तुझे खोते रहे पैहम।

हमें कोई उठाए फिर रहा था अपनी बाँहों में,
हम अपने आप को बेकार ही ढोते रहे पैहम।

दुआ देती रही दुनिया हमें सुर्ख़ाब होने की ,
हम अपने ही लहू में तर ब तर होते रहे पैहम।

हमें बाँहों में लेके प्यार से चूमा नहीं जब तक ,
लिपटकर ज़िन्दगी से तब तलक रोते रहे पैहम।

यक़ीं मनो वो कल शब् ख़्वाब में ख़ुद चल के आया था ,
मगर ऐसा हुआ हम रात भर सोते रहे पैहम।






तेरे ज़ख़्मों को इंदेमाल करें।
आ तबीयत तिरी बहाल करें।

एक मुद्दत के बाद देखा है ,
तुझसे इक तल्ख़  सा सवाल करें।

जिसको खोने का शरफ़ हासिल है ,
उसको  खोने का क्या मलाल करें।

मैं   उन्हें   बोलते  हुए  देखूं ,
वो  मिरा बोलना  मुहाल करें।

कौन संजीदगी से सुनता है ,
किस भरोसे पे अर्ज़ ए हाल करें।

बारहा तुझको याद आ आकर ,
तेरी ख़ल्वत में इख़्तेलाल करें।

जी में आता है एक दिन ख़ुद को ,
अपने हाथों से पायमाल करें।




वक़्त ए रुख़सत हिसाब कर देगी।
ज़िन्दगी लाजवाब कर  देगी।

जोड़ती जा रही है बाब मिरे ,
तू तो मुझको निसाब कर देगी।

कोई गोशा तलाशना होगा ,
वरना दुनिया ख़राब कर देगी।

ये तिरी ख़्वाब परस्ती इक दिन ,
हर हक़ीक़त सराब कर देगी।

गर कोई उसकी आरज़ू पूछे ,
वो मिरा इन्तेख़ाब कर देगी।

ये कहानी है पिछले जन्मों की ,
पल में कैसे ख़िताब कर देगी।

ये जो ग़मसाज़ सी तबीयत है ,
तुझको महव ए सराब कर देगी।




जब तिरी दास्ताँ सुनाई दी।
तब हमें रौशनी दिखाई दी।

हमने जब भी उदासियाँ लिखीं ,
तेरी पलकों ने रौशनाई  दी।

ख़्वाब आँखों में रख लिए तेरे ,
हमने नींदों को मुंह दिखाई दी।

वार जी जान से किया उसने ,
हमने अग़यार को बधाई दी।

दिन में कुछ भी नज़र नहीं आया ,
मेरी आँखों ने रतजगाई दी।

उसका चेहरा दिखा दिया उसको ,
हमने तरक़ीब से सफ़ाई दी।

एक तो दाम में फंसे उस पर ,
हमने सय्याद को बंधाई दी।