Friday, 29 August 2014
Tuesday, 26 August 2014
किसी भी शै पे आ जाने में कितनी देर लगती है।
मगर फिर दिल को समझाने में कितनी देर लगती है।
ज़रा सा वक़्त लगता है कहीं से उठ के जाने में,
मगर फिर लौट कर आने में कितनी देर लगती है !
बला का रूप, ये तेवर , सरापा धार हीरे की,
किसी के जान से जाने में कितनी देर लगती है ?
फ़क़त आँखों की जुम्बिश से बयां होता है अफ़साना
किसी को हाल बतलाने में कितनी देर लगती है ?
सभी से ऊबकर यूँ तो चले आये हो ख़ल्वत में ,
मगर ख़ुद से भी उकताने में कितनी देर लगती है ?
शऊर ए मैकदा इसकी इजाज़त ही नहीं देता,
वगरना जाम छलकाने में कितनी देर लगती है !
ये शीशे का बदन लेकर निकल तो आये हो लेकिन,
किसी पत्थर से टकराने में कितनी देर लगती है ?
मनीष शुक्ला
کسی بھی شے پہ آ جانے میں کتنی دیر لگتی ہے
مگر پھر دل کو سلجھانے میں کتنی دیر لگتی ہے
ذرا سا وقت لگتا ہے کہیں سے اٹھ کے جانے میں
مگر پھر ل وٹ کر آنے میں کتنی دیر لگتی ہے
بلا کا روپ یہ تیور سراپا دھار ہیرے کی
کسی کے جان سے جانے میں کتنی دیر لگتی ہے
فقط آنکھوں کی جمبش سے بیاں ہوتا ہے افسانہ
کسی کو حال بتلانے میں کتنی دیر لگتی ہے
سبہی سے اوب کر یوں تو چلے آے ہو خلوت میں
مگر خود سے بھی اکتانے میں کتنی دیر لگتی ہے
شعور میکدہ اسکی اجازت ہی نہیں دیتا
وگرنہ جام چھلکانے میں کتنی دیر لگتی ہے
یہ شیشے کا بدن لیکر نکل تو آے ہو لیکن
کسی پتھر سے ٹکرانے میں کتنی دیر لگتی ہے
منش شکلا
Monday, 21 July 2014
तमाम दर्द को चेहरे पे इक़्तेबास किया।
कि इक हंसी ने हर इक ग़म को बेलिबास किया।
तुम्हारा हौसला रखने को हंस दिए वरना ,
तुम्हारी बात ने हमको सिवा उदास किया।
न रास्ते की ख़बर ही रही न मंज़िल की ,
सफ़र के शौक़ ने किस दरजा बदहवास किया।
जहां से उठ के चले थे जहाँनवर्दी को ,
सफ़र तमाम उसी दर के आस पास किया।
फ़क़त ख़ुशी ही से वाक़िफ़ थी नासमझ अब तक ,
नज़र को कितनी मशक़्क़त से ग़मशनास किया।
वो जिसको कह के कोई भूल भी गया कबका ,
तमाम उम्र उस इक बात का ही पास किया।
हर एक शै की ज़रुरत पड़ी कहानी में ,
कभी ख़ुशी तो कभी ग़म से इल्तेमास किया।
मनीष शुक्ला
Wednesday, 16 July 2014
Wednesday, 9 July 2014
सहर से शाम रहती है यही मुश्किल मिरे आगे
कभी रस्ता मिरे आगे कभी मंज़िल मिरे आगे।
कभी माज़ी की वहशत है, कभी फ़र्दा की दहशत है ,
मिरा मक़्तल मिरे पीछे , मिरा क़ातिल मिरे आगे।
न कुछ कहते बना मुझसे, न कुछ करते बना मुझसे ,
मिरा दुश्मन मिरे घर में, हुआ दाख़िल मिरे आगे।
समंदर के बहुत से राज़ पिन्हां हैं मिरे दिल में ,
बहुत सी कश्तियाँ डूबीं सर ए साहिल मिरे आगे।
मुदावा कर ,मुदावा कर ,मुदावा कर मुहब्बत का ,
ये कहके फूट कर रोया दिल ए बिस्मिल मिरे आगे।
मिरी दुखती हुई रग को अचानक छू दिया तुमने ,
ये किसका ज़िक्र ले आये सर ए महफ़िल मिरे आगे।
अभी बस ख़ाक है , ख़ाशाक हैं, सहरानवर्दी है,
सफ़र के बाद आएगा मिरा हासिल मिरे आगे।
मनीष शुक्ला
Tuesday, 8 July 2014
سحر سے شام رہتی ہے یہی مشکل مرے آگے
کبھی رستہ مرے آگے کبھی منزل مرے آگے
کبھی ماضی کی وحشت ہے کبھی فردا کی دہشت ہے
مرا مقتل مرے پیچھے مرا قاتل مرے آگے
نہ کچھ کہتے بنا مجھسے نہ کچھ کرتے بنا مجھسے
مرا د شمن مرے گھر میں ہوا داخل مرے آگے
سمندر کے بہت سے راز پنہا ہیں مرے دل میں
بہت سی کشتیاں ڈوبیں سر ساحل مرے آگے
مداوا کر مداوا کر مداوا کر محبّت کا
یہ کہکے پھوٹ کر رویا دل بسمل مرے آگے
مری دکھتی ہوئ رگ کو اچانک چھو دیا تمنے
یہ کسکا ذکر لے آے سر محفل مرے آگے
ابھی بس خاک ہے خاشاک ہیں صحرا نوردی ہے
سفر کے بعد آےگا مرا حاصل مرے آگے
منش شکلا
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