Wednesday, 15 November 2017



हमसफ़र ऊब चुका है मुझसे। 
रास्ता  पूछ    रहा   है  मुझसे। 

एक  नाकाम   सी   शनासाई ,
बस  यही काम हुआ है मुझसे। 

क्यूँ   मुझे  देख  रहा   है   ऐसे ?
क्या तिरा  दर्द सिवा है मुझसे ?

क्यूँ   मिरे  तौर  आज़माता है ?
तेरा  किरदार जुदा   है मुझसे। 

तू क्यूँ ज़ाहिर पे ग़ौर करता है ,
तू तो अंदर से जुड़ा है मुझसे। 

मेरे  मरते  ही  क़यामत  होगी ,
मैं ही महशर हूँ ख़ुदा है मुझसे। 

तू  फ़रामोश  कर  ख़ता मेरी ,
तेरा दरजा तो बड़ा है  मुझसे। 

उसपे रह रह के प्यार आता था ,
वो यूँ रह रह के लड़ा है मुझसे। 

मेरी क़िस्मत है कि मैं हूँ पानी ,
आग  बेकार  ख़फ़ा  है  मुझसे। 
मनीष शुक्ला 







ہمسفر اوب  چکا  ہے  مجھ  سے 
راستہ  پوچھ  رہا  ہے  مجھ  سے 

ایک     ناکام       سی     شناسائی 
بس  یہی  کام  ہوا  ہے  مجھ  سے 

کیوں  مجھے دیکھ  رہا ہے ایسے 
کیا  ترا  درد  سوا  ہے  مجھ  سے 

کیوں   مرے    طور   آزماتا   ہے 
تیرا   کردار   جدا   ہے  مجھ  سے 

تو کیوں  ظاھر  پہ  غور کرتا  ہے  
تو تو اندر سے جڑا  ہے مجھ  سے 

تو    فراموش    کر   خطا   میری 
تیرا  درجہ  تو  بڑا  ہے  مجھ سے 

اس   پہ   رہ  رہ  کے  پیار  آتا تھا 
وہ یوں رہ رہ کے لڑا ہے مجھ سے 

میری  قسمت  ہے کہ میں ہوں پانی 
آگ   بیکار    خفا   ہے  مجھ  سے 

میرے   مرتے   ہی    قیامت   ہوگی
 میں ہی محشر ہوں خدا ہے مجھ سے 

منیش شکلا 

Monday, 13 November 2017




روشنی جاری کرو

جملہ حقوق محفوظ : انتما شکلا

سن اشاعت : ٢٠١٧

قیمت :روپیہ   ٢ ٥ ٠

ے ایس بے ان نمبر :

نأثر :

طباعت : 



تعا رف 

 نام : منیش شکلا 

والد : مرحوم  ادےشنکر شکلا 

والدہ : شری مٹی سشما شکلا  

پیدایش : ١٩٧١  

(وطن : انناؤ ( اتر پردیش 

(تعلیم : ایم اے (انتھروپولوجی  :  

پیشہ : سرکاری نوکری 

رہائش : ٨/٤ ڈالی باغ آفیسرس کالونی 

لکھنؤ 

رابطہ  :9415101115  

 manishlko97@gmail.com  : ای میل 

Thursday, 2 November 2017



भटकता    कारवां   है   और   मैं   हूँ। 
तलाश   ए   राएगां   है   और   मैं  हूँ। 

बताऊँ क्या तुम्हें हासिल सफ़र का ,
अधूरी    दास्तां    है   और    मैं    हूँ। 

नया  कुछ  भी  नहीं  क़िस्से  में  मेरे ,
वही  बोझल   समां  है  और  मैं   हूँ। 

  हर इक जानिब तिलस्माती मनाज़िर ,
नज़र   का   इम्तेहां  है   और  मैं  हूँ। 

कोई  शाहिद  नहीं   सजदों  का मेरे ,
जबीं  पर  इक  निशां  है  और मैं  हूँ। 

   शिकस्ता बाल ओ पर तकते हैं मुझको ,
फ़सील   ए  आस्मां   है   और   मैं  हूँ। 

दुआ  मांगूँ  कहाँ  किस  दर  पे जाके ,
दयार  ए   बे  अमां    है   और   मैं  हूँ। 

बहुत  धुंधली  नज़र  आती है दुनिया ,
उमीदों   का   धुवां   है   और   मैं   हूँ। 

भटकता  हूँ  ज़मीं  प र  सर  बरहना ,
फ़लक  का  सायबां  है  और   मैं  हूँ। 
मनीष 




सफ़र  के  तसव्वुर  से सहमा  हुआ  हूँ। 
बड़ी   देर   से   यूँ   ही  ठहरा  हुआ  हूँ। 

उधर    डूबते     जा    रहे    हैं    सितारे ,
इधर  मैं  ख़यालों  में   उलझा  हुआ  हूँ। 

 जलाने के क़ाबिल न लिखने के लाएक़ ,
मैं  काग़ज़  हूँ  सादा  प  भीगा  हुआ हूँ। 

संभाले  हूँ  ख़ुद  को  बड़ी  काविशों से ,
मुझे  छू  न   लेना  मैं   चटख़ा  हुआ  हूँ। 

मुसलसल  पड़ी  है  कड़ी धूप  मुझ पर ,
मिरा   रंग   देखो   मैं  कैसा   हुआ   हूँ। 

न  बाक़ी  है  साया न  बर्ग ओ  समर हैं ,
मैं मौसम की साज़िश का मारा हुआ हूँ। 

थमेंगी   कभी   तो   मुख़ालिफ़   हवाएं ,
यही सोच कर खुद  में सिमटा हुआ हूँ। 
मनीष शुक्ल