माज़ी में खुलने वाले हर बाब से लिपटी रहती हैं।
जाने वालों की यादें असबाब से लिपटी रहती हैं।
अहल ए सफ़र तो गुम हो जाते हैं दरिया की लहरों में ,
कश्ती की टूटी बाहें गिरदाब से लिपटी रहती हैं।
कभी कभी कुछ ऐसे दिलकश मंज़र दिखते हैं शब् भर ,
नींद भी खुल जाए तो आँखें ख़्वाब से लिपटी रहती हैं।
तर्क ए तअल्लुक़ ख़त्म नहीं कर पाता है अहसासों को ,
रिश्तों की टूटी कड़ियाँ अहबाब से लिपटी रहती हैं।
तूफ़ानों का ज़ोर बहा ले जाता है बुनियादों को ,
रेज़ा रेज़ा तामीरें सैलाब से लिपटी रहती हैं।
उजड़े घर की वीरानी का सोग मनाने की ख़ातिर ,
ख़स्ता छत की शहतीरें मेहराब से लिपटी रहती हैं।
उसको दिन भर तकते तकते डूब तो जाता है लेकिन।
सूरज की बुझती नज़रें महताब से लिपटी रहती हैं।
मनीष शुक्ला
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