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Friday, 15 June 2012


ज़मीं के हाथ यूँ  अपना शिकंजा कस रहे  थे,
सुतूँ  सारे महल के  रफ्ता रफ्ता धंस  रहे  थे,

उम्मीदें लम्हा लम्हा घुट के मरती जा रही थीं,
अजब  आसेब से आकर दिलों में  बस रहे थे,

शजर पर जह्र ने अब रंग दिखलाया है अपना,
रुतों   के  सांप यूँ  तो मुद्दतों से  डस  रहे थे,

मिरा  सूरज मिरी आँखों के आगे बुझ रहा था,
मिरे  साये मिरी  बेचारगी  पर  हंस  रहे थे,

पड़े हैं वक़्त की चोटों से अब मिस्मार होकर,
वही  पत्थर जो अपने दौर में पारस  रहे  थे,

उजाड़ा  किस तरह आंधी  ने  बेदर्दी  से देखो,
नगर ख़्वाबों  के कितनी हसरतों से बस रहे थे,

उड़ानों ने किया था  इस क़दर मायूस उनको,
थके  हारे  परिंदे  जाल में खुद फँस  रहे  थे,
मनीष शुक्ल 

Wednesday, 13 June 2012


किसी के इश्क़   में बर्बाद  होना,
हमें आया  नहीं  फ़रहाद   होना।

मुहब्बत का सबक़ आसां लगे है,
बहुत मुश्किल है लेकिन याद  होना।

बहुत प्यारी है आज़ादी  की चाहत,
मगर अच्छा  नहीं आज़ाद होना।

हमें अश्कों से निस्बत हो गयी है,
नहीं  मुमकिन हमारा शाद होना।

वहां भी फूट कर रोना  पड़ा  है,
जहाँ मुमकिन न था नाशाद होना।

कई बातें भुला  देना ही  बेहतर,
ज़रूरी  तो  नहीं सब याद होना .

सहारे  की  ज़रुरत  है हमें  भी,
मगर मिन्नतकश ए इमदाद होना?

कोई तामीर की सूरत तो निकले,
हमें  मंज़ूर  है  बुनियाद  होना।

बनाता  है सफ़र को  खूबसूरत ,
मुसाफ़त  की कोई मीयाद  होना।
मनीष शुक्ल



 सफ़र   के  ख़त्म  का  इमकान  है क्या?

 अब    आगे   रास्ता  सुनसान   है  क्या?


 अजब  इक  ख़ौफ़  सा तारी  है  दिल पे,

 ख़मोशी      में    निहाँ   तूफ़ान  है  क्या?


 मुदावा   क्यूँ  नहीं  करता  है आख़िर ?

 मिरे   दुःख   से  ख़ुदा  अनजान  है क्या?

    सभी  ख़ामोश   हो  जाते हैं  पढ़कर ,

   कोई  उलझा  हुआ फ़रमान  है  क्या ?



  बिछड़  जाने  की  बातें  कर  रहे हो,


बिछड़  जाना बहुत आसान  है क्या?




बहुत  ग़मगीन   हैं  आँखें  तुम्हारी,

मिरा  मंज़र  बहुत  वीरान है  क्या?



 जो  हर लम्हा  बदलता  जा  रहा है;


 यही  चेहरा  मिरी  पहचान है क्या ?





मनीष शुक्ल