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Tuesday, 20 June 2017


तुझ   तक  आने  जाने  में  ही टूट गए।
दीवाने    वीराने      में    ही   टूट   गए।

वो    औरों   को  कांधा   देने  वाले   थे ,
अपना   बोझ    उठाने  में  ही  टूट गए।

हम  जो अच्छे फ़नकारों में शामिल थे ,
इक   किरदार  निभाने  में  ही टूट गए।

दुनिया तक फिर जाम भला कैसे लाते ,
मयकश  तो  मैख़ाने  में  ही   टूट   गए।

होंठों तक तो सिर्फ़ तमाज़त ही पहुंची ,
नश्शे   तो   पैमाने   में   ही   टूट   गए।

क्या उनका फिर  हाल तबाही में होता ,
वो  तो   ख़ैर  मनाने  में  ही  टूट   गए।

हमको अपने  साथ  गुज़ारा करना था ,
हम  ख़ुद  को समझाने  में ही टूट गए।
ऊपर   तो  बस  चांदी  सोना ही आया ,
मोती   तो   तहख़ाने  में  ही   टूट  गए।
तुमको  सारी  रात  कहानी कहनी थी ,
तुम  तो   इक अफ़साने में ही टूट गए। 

मनीष शुक्ला 





जब  आसमान  का समझे नहीं इशारा तुम। 
तो फिर ज़मीं को कहाँ रह सके गवारा तुम। 

तुम्हारे    दैर   का  सबसे   हक़ीर   ज़र्रा  हम ,
हमारे  चर्ख़  का  सबसे  हसीं  सितारा   तुम। 

अब  इसके  बाद  हमें  दीद  की नहीं  हाजत ,
नज़र  के  वास्ते  हो  आख़िरी  नज़ारा   तुम। 

बढ़ा  के  क़ुर्बतें  बीमार  कर   दिया   हमको ,
अब  आके  हाल  भी पूछो कभी हमारा तुम। 

तुम्हारी  आग   में  जलते  हुए  सरापा  हम ,
हमारी   राख  से  उठता  हुआ  शरारा  तुम। 

तुम्हारी  बात  पे  हमको  हसीं  सी  आती है ,
हमारा   हाल  न   पूछा  करो  ख़ुदारा   तुम। 

हमारे    साथ  से   तुम  मुत्मईं   नहीं   लगते ,
हमारे  साथ  में  करते  तो  हो  गुज़ारा  तुम। 

मनीष शुक्ला 


किसी को ग़म ने किसी को ख़ुशी ने तोड़ दिया। 
हमें  तो   जिसने  बनाया  उसी  ने   तोड़  दिया। 

हम   भी  बेबाक  तकल्लुम  पे  यक़ीं   रखते  थे ,
हमें   भी  शहर  की   तानाज़नी  ने  तोड़  दिया। 

तिरा   भी  ज़ब्त  मिरे आंसुओं  में  बह  निकला ,
मिरा   भी   सब्र   तिरी   बेबसी   ने   तोड़  दिया। 

जगह    जगह   पे   द रारें   पड़ीं   तकब्बुर   पर ,
मिरी  अना   का क़िला  आशिक़ी ने तोड़  दिया। 

इसी  के  ज़ोम पे  हस्ती  को  दिल्लगी  समझा ,
मिरा   ग़ुरूर   इसी   ज़िन्दगी  ने   तोड़   दिया। 

अबस   शराब   पे  इलज़ाम  रख   रहे  हैं  लोग ,
मिरा   नशा   तो  तिरी  बेरुख़ी  ने  तोड़  दिया। 

मिरे मलाल को अब रो के और सिवा  मत कर ,
मिरा   भरम  तो  तिरी इक हंसी ने तोड़ दिया।
हुदूद  ए  ज़ीस्त  से  बाहर  निकल  गए प्यासे ,
तलब   का  दाएरा  तिशनालबी  ने तोड़ दिया। 

अब अपना ध्यान किसी चीज़ में नहीं लगता ,
हमारा  ध्यान तो कबका किसी ने तोड़ दिया। 
मनीष शुक्ला  


एक तो इश्क़ ख़ुद मुसीबत है।
उसपे हमको वफ़ा की आदत है।

अब भी ख्वाबों में उसका आ जाना ,
जाने किस बात की अलामत है।

आपके तेवरों से है ज़ाहिर ,
आपकी आपसे अदावत है।

आह भरते हैं चीख़ लेते हैं,
आजकल दर्द की इनायत है।




वक़्त    पैग़ाम    का    नहीं   शायद। 
अब   मरज़   नाम  का  नहीं  शायद। 

इसका चाहा  न कुछ हुआ अब तक ,
दिल   किसी  काम  का नहीं शायद। 

अब    सहीफ़े    ज़मीं   से   उगते  हैं ,
 दौर    इल्हाम    का   नहीं    शायद। 

  उतरा   उतरा ,   सियाह  , अफ़सुर्दा  ,
 रंग    ये   शाम   का    नहीं    शायद। 

 ख़ामुशी      की     तनाब    टूटी    है ,
शोर   कुहराम    का   नहीं   शायद। 

इश्क़     करना    तबाह   हो   जाना ,
काम     ईनाम    का   नहीं   शायद। 

मनीष शुक्ला 


 आख़िरी  बयानों  में   और न  पेशख़्वानी  में। 
 हम   कहीं  नहीं   आते  आपकी कहानी   में। 

  हम  तमाम   रस्ते   पर  बारहा  मिले  लेकिन 
   देख    ही    नहीं   पाए   आप   बदगुमानी  में। 

  इख़्तिलाफ़   किरनों   का  ऊपरी दिखावा था ,
  एक   हो    गए   सारे   रंग   गहरे   पानी   में। 

    इनसे   तुम  अकेले   में गुफ़्तगू  किया करना ,
     लफ़्ज़   देके  जाएंगे   हम   तुम्हें  निशानी  में। 

  आज    वो   परीचेहरा  बात   कर गया हमसे,
    नाम  तक  नहीं  पूछा  हमने   शादमानी   में। 

    एक  दफ़ा   गए तो  फिर लौट कर  नहीं आये ,
     चूक   हो  गयी   हमसे   अपनी  मेज़बानी  में। 

     तुम  ज़रा  से   ज़ख़्मों  से तिलमिलाए बैठे  हो ,
   सर  कटाए   बैठे    हैं   लोग   हक़बयानी  में। 

मनीष शुक्ला 


जब  आफ़ताब  मिरी  धज्जियाँ   उड़ा  देगा। 
तब   आके  चाँद   मुझे   चांदनी   उढ़ा  देगा। 

मैं  फिर ज़मीं की नसीहत को  भूल जाऊँगा ,
हवा  के  दोश  पे मुझको  वो फिर चढ़ा देगा। 

मैं   रो    के  और   उसे   मुतमईन  कर  दूंगा ,
वो   हंसके   और  मिरे  दर्द   को   बढ़ा  देगा। 

 ये  जो  वजूद  के धब्बे  हैं  इनका  क्या  होगा ?
रिदा   के   दाग़  तो   माना  कोई  छुड़ा   देगा।
 अजीब   ढंग  से  करता  है  रू  ब  रू  मुझको ,
ये   आईना   तो  मुझे  ख़ुद  से  ही  लड़ा देगा।
  फिर   उसके   बाद  उसी  की  ज़ुबाँ में  बोलोगे ,
 वो   चंद    रोज़  में   सारे   सबक़   पढ़ा   देगा। 

ज़ुबाँ  को   बींध  के   रख  देगा   एक  लम्हे में ,
नज़र  का  तीर  वो   चेहरे  पे  जब  गड़ा  देगा। 
मनीष शुक्ला