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Thursday, 22 March 2018



ناخداؤں   کی   سرپرستی  میں 
جی رہے ہیں خدا کی بستی میں 

سنگ  ساری سے در نہیں لگتا 
چوٹ کھائی ہے گل پرستی میں 

رہن  رکھنی  پڑی   ہیں  تعبیریں 
خواب دیکھا تھا تنگ  دستی میں 

ایری غیری  شراب  مت  چھونا 
فرق ہوتا ہے مہنگی سستی میں 

تیرے  چاہے   بغیر   مٹ   جائے 
اتنی  جرأت  کہاں ہے ہستی میں 

لوگ  پتھر  کے  ہو گئے  دیکھو 
اتنا  ڈوبے  ہیں  بت  پرستی میں 

جب  سے  آتش  فروش اے ہیں 
آگ  لگنے  لگی  ہے  بستی میں 

چلتے چلتے نکل گئے خود سے 
ہم  بھی  دیوانگی کی مستی میں 

اب    تو   ہم  کو  عروج  پر   لاؤ 
کب سے ڈوبے ہوئے ہیں پستی میں 
منیش شکلا 


Tuesday, 6 March 2018



بعض   اوقات   بھی   نہیں   کرتے 
اب  تری   بات  بھی   نہیں   کرتے 

ایک  تو  دھوپ  چھین لی اس  پر 
ابر   برسات    بھی   نہیں    کرتے 

اب    کوئی    اجنبی    نہیں   لگتا 
اب   ملاقات    بھی    نہیں   کرتے 

کتنا  کچھ  بھر گیا ہے سینے میں 
اور   ہم  بات   بھی    نہیں   کرتے 

ہم   اگر تجھ  سے بد گماں   ہو تے 
تو   سوالات    بھی   نہیں    کرتے 

وہ   ہی   سارے  فساد کی جڈ ہیں 
اور  فسادات   بھی    نہیں   کرتے 

شب  کی  تنہائیوں  کی خواہش  ہے 
دشت   میں  رات  بھی  نہیں  کرتے 

منیش شکلا 

Monday, 5 February 2018


اس  سے  ملنا     محال    تھا   اپنا 
ہجر   جیسا     وصال      تھا    اپنا 

وہ بھی رویا نہیں تھا  برسوں سے 
اس  کے  جیسا  ہی  حال   تھا اپنا 

سیدھے سیدھے  جواب  دے  دیتے 
سیدھا    سادہ     سوال    تھا  اپنا 

تیری  قربت میں آ کے  ہنستے ہیں 
ورنہ   ہم    کو    ملال    تھا   اپنا 

اس کے جاتے ہی بجھ گیا سب کچھ 
اس  کے  دم  سے  جلال  تھا  اپنا 

ہم نے جی بھر کے   چاندنی  چکھی 
اپنی   چھت   تھی    ہلال   تھا  اپنا 

بات  بھی  معرکہ   کی  کہتے تھے 
اس   پہ    لہجہ    کمال    تھا  اپنا 

ہم کو  جانا تھا اب بھی میلوں تک 
جسم  تھک   کر   نڈھال   تھا  اپنا 

وہ  اندھیرے  میں  ہی  گیا  اٹھ کر 
اس    کو   اتنا    خیال   تھا   اپنا 


منیش شکلا 

Wednesday, 31 January 2018




सीने में  उम्मीद का  सूरज  और  आँखों  में  पानी   है। 

बदलेंगे  तस्वीर  ज़माने   की   ये   दिल  में  ठानी   है। 

हमने  इक ख़ुशहाल चमन का ख़्वाब सुनहरा देखा  है ,

हमको हर इक फूल की रंगत फिर वापस लौटानी है। 


साहिल से मुस्कुरा के तमाशा न देखिये,

हमने ये ख़स्ता नाव विरासत में पाई है।



बारिश के इंतज़ार में सदियां गुज़र गयीं ,

उट्ठो  ज़मीं को चीर के पानी निकाल लो। 


हर एक ज़र्रे के रुख़ पर निखार आने तक ,
उदास बाग़ के दिल को क़रार आने तक ,
चमन का फूल का रंगों का तब्सरा होगा ,
कुछ इंतज़ार तो करिये बहार आने तक 

शहर के अंधेरे को  इक चराग़ काफ़ी है,

सौ चराग़ जलते हैं  इक चराग़ जलने से।

ज़मीं के ख़ार चुनने से चमन में फूल आने तक। 
हमीं मिलते रहे हैं ख़ाक में पतझड़ के जाने तक। 
हमारी बाग़बानी पर वही उंगली उठाते हैं ,
कि जिनको बाग़ से मतलब रहा ख़ुश्बू चुराने तक।  

मेरे जुनूं का नतीजा ज़रूर निकलेगा।

इसी सियाह समंदर से नूर निकलेगा।


न हमसफ़र  न किसी  हमनशीं से निकलेगा।

हमारे पाओं  का  कांटा  हमीं  से  निकलेगा।


तमाम    राह     तुम्हें     बारहा     रुलाएंगे।
सफ़र  के  सारे    मक़ामात   याद    आएंगे।
ये जिनकी रौशनी तुमको अखर रही है अभी ,


यही     चराग़    तुम्हें    रास्ता     दिखाएंगे।

Wednesday, 17 January 2018



اس  سے  ملنا     محال    تھا   اپنا 
ہجر   جیسا     وصال      تھا    اپنا 

وہ بھی رویا نہیں تھا  برسوں سے 
اس  کے  جیسا  ہی  حال   تھا اپنا 

سیدھے سیدھے  جواب  دے  دیتے 
سیدھا    سادہ     سوال    تھا  اپنا 

تیری  قربت میں آ کے  ہنستے ہیں 
ورنہ   ہم    کو    ملال    تھا   اپنا 

اس کے جاتے ہی بجھ گیا سب کچھ 
اس  کے  دم  سے  جلال  تھا  اپنا 

ہم نے جی بھر کے   چاندنی  چکھی 
اپنی   چھت   تھی    ہلال   تھا  اپنا 

بات  بھی مارکہ   کی  کہتے تھے 
اس   پہ    لہجہ    کمال    تھا  اپنا 

ہم کو  جانا تھا اب بھی میلوں تک 
جسم  تھک   کر   نڈھال   تھا  اپنا 

وہ  اندھیرے  میں  ہی  گیا  اٹھ کر 
اس    کو   اتنا    خیال   تھا   اپنا 
منیش شکلا 


Tuesday, 26 December 2017



گزاری   عمر   پیالہ  و  مے   بنانے  میں 
 پھر  ہم نے آگ لگا دی شراب  خانے  میں 

خود   اپنے  آپ کو ہم  دیکھ ہی نہیں  پاے 
ہمارا   دھیان   لگا  ہی  رہا    زمانے  میں 

سب اپنے آپ کو ڈھونڈھا کئے بہر صورت 
ہم  اپنی  داستاں  کہتے  رہے  فسانے میں 

تمھاری  یاد  ستاے گی   عمر   بھر  ہم   کو 
ذرا  سا  وقت  لگے گا  تمھیں بھلانے میں 

یوں  ایک  پل  میں زمیندوز مت کرو ہم کو 
ہزاروں  سال  لگے  ہیں  ہمیں  بنانے میں 

خود  اپنے  آپ  کے  کتنا  قریب  آ  پہنچے 
ہم  اپنے  آپ  کو  تیرے  قریب  لانے  میں 

ہماری   تشنہ    دہانی    کا    کارنامہ   ہے 
لگی  ہیں اوس کی بوندیں ندی بنانے میں 

ہماری   داستاں  کتنی  طویل   تھی  دیکھو 
تبھی  تو  دیر  لگائی  تمھیں  سنانے  میں 

منیش شکلا 

Monday, 25 December 2017



गुज़ारी  उम्र  पियाला   ओ  मय  बनाने  में। 
फिर हमने  आग  लगा  दी  शराबख़ाने में। 

ख़ुद अपने आप  को हम  देख ही नहीं पाए ,
हमारा  ध्यान  लगा   ही   रहा  ज़माने   में। 

सब  अपने  आप को  ढूंढ़ा किए बहरसूरत ,
हम  अपनी  दास्ताँ  कहते  रहे  फ़साने में। 

तुम्हारी  याद   सताएगी   उम्र  भर  हमको ,
ज़रा   सा  वक़्त   लगेगा   तुम्हें   भुलाने  में। 

यूँ  एक  पल में  ज़मींदोज़  मत करो हमको ,
हज़ारों   साल    लगे   हैं    हमें   बनाने   में। 

ख़ुद अपने आप के कितना क़रीब आ पहुंचे ,
हम  अपने  आप  को  तेरे   क़रीब  लाने  में।

हमारी   तिश्ना   दहानी    का   कारनामा   है ,
लगी   हैं   ओस  की   बूँदें   नदी   बनाने  में। 

हमारी  दास्ताँ   कितनी   तवील   थी  देखो ,
तभी   तो   देर    लगाई    तुम्हें   सुनाने   में। 
मनीष शुक्ला