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Wednesday, 11 July 2018



منیش شکلا 
٨/٤ 
ڈالی باغ  آفیسرس کالونی 
لکھنؤ 
٢٢٦٠٠١



محترم جناب شمس الرحمان  فاروقی صاحب 

پرخلوص آداب 

 بعد سلام سب سے پہلے معذرت کہ اتنی تاخیر سے آپکو سلام  پیش کرنے کی ہمّت
 جٹا پایا  - میں آپکا دل کی گہرائیوں  سے شکرگزار  اور  ممنون  ہوں کہ   آپ  نے
 مجھ جیسے نو پیدا تخلیق کار کی ناقص  کتاب " روشنی جاری کرو"  پہ اپنا  بیش
 قیمت وقت دے  کر اظہار  راۓ  کی  زحمت  فرمائی  -آپکو  برسوں سے  پڑھ  رہا
 ہوں اور آپکی بین ا لاقوامی شخصیت اور علم سے آشنا ہوں - میرے لئے آپکےیہ 
چند الفاظ کتنا  بڑا  اثاثہ  ہیں  میں  بتا  نہیں  سکتا   -آپکے  ایک خط نے مجھے
 کتنا حوصلہ عطا  کیا  ہے  میں  بیان نہیں کر سکتا  -  کبھی  خواب  میں  بھی نہیں
 سوچا تھا کہ آپکے  دست مبارک  سے لکھا  ہوا خط مجھے  موصول   ہوگا  - الله 
 -آپکو صحتیاب  رکھے اور آپکی عمر   دراز  کرے -  آپ  ہمارے وقت کا اثاثہ  ہیں
 گزارش ہے کہ اپنے ذہن  کے کسی گوشے میں مجھے بھی جگہ  دے دیجییگا اور 
میرے واسطے دعا کیجیےگا  کہ میں اس انتشار زدہ  دنیا  میں ٹھیک  ڈھنگ  سے
 جینے کی صلاحیت حاصل  کر سکوں  اور اگر اوپر والے نے  مجھے  شاعری  کا 
- فن عطا   کیا  ہو  تو اسکو  آخری  حد  تک  پہنچا کے دنیا سے رخصت ہو سکوں
 ایک  بار  پھر آپکا  دل  کی گہرائیوں  سے  شکریہ کہ  اپنے مجھے  اپنی   توجھ 
  کے لایق  سمجھا  - انشا الله  کسی  روز  آپکے  رو برو  سلام  پیش  کرنے آپکی 
- بارگاہ میں حاضر ہوتا ہوں

ممنون و مشکور 
آپکا  


منیش شکلا 
لکھنؤ 

Tuesday, 10 July 2018



پالکی   روک   لو  بہاروں   کی 
آخری   شام   ہے  نظاروں   کی 

اب  سبق  حفظ  ہو  گیا   ہم   کو 
اب  ضرورت  نہیں  اشاروں کی 

اس  میں پربت کا دل پگھلتا ہے 
یہ   کہانی   ہے   آبشاروں  کی 

راستہ  بھی  ہے  خارزاروں  کا 
منزلیں  بھی  ہیں خارزاروں  کی 

ہم  ستارے  بھی  توڈ لاتے تھے 
شرط  رکھتے تھے ماہپاروں  کی 

خود  کو ایسے اداس مت رکھیے 
جان   جاتی  ہے غم گساروں  کی 

 جانثاری    کی   بات    کی  جاۓ 
یہ  ہے   توہین     جانثاروں   کی 

آپ  خود کو سنبھال   کر  رکھیے 
آپ  تصدیق   ہیں   بہاروں    کی 

اب  سحر  تک  اداس  رہنا   ہے 
روشنی   بجھ   گیئ شراروں کی 
منیش 


Friday, 6 July 2018



کہانی  کو  کہاں  منظور  تھے  ہم 
مگر  کردار  کیا  بھرپور  تھے ہم 

وہاں  ہونا   پڑا  ہے  سر  بسجدہ 
کشیدہ  سر  جہاں مشہور تھے ہم 

اب آنکھیں  ہی نہیں اٹھتیں ہماری 
بہت  دن تک بہت مغرور  تھے ہم 

وہ قد قامت  تمھارے ساتھ ہی تھا 
تمھارے  بعد  چکناچور  تھے  ہم 

تمہارے  بعد  روشن  ہو  گئے ہیں 
تمھارے  سامنے  بےنور تھے ہم 

تمھیں  ہم  شکریہ بھی کھ نہ پاے 
تمھارے  اس قدر مشکور تھے ہم 

مداوا  ہی  نہیں  ممکن  تھا  کوئی 
اک ایسے زخم  کا ناسور  تھے ہم 
منیش 

Thursday, 28 June 2018



गुज़ारी उम्र पियाला ओ  मय बनाने में।
फिर आग हमने लगा दी शराबख़ाने में.

ख़ुद आपने आप को हम देख ही नहीं पाए ,
हमारा ध्यान लगा ही रहा ज़माने में।

सब अपने आप को ढूँढा किये बहर सूरत ,
हम अपना आप सुनाते रहे फ़साने में।

तुम्हारी  याद सताएगी उम्र भर हमको ,
ज़रा सा वक़्त लगेगा तुम्हें भुलाने में।

यूँ एक पल में ज़मींदोज़ मत करो हमको ,
हज़ारों  साल  लगे हैं  हमें  बसाने  में।

ख़ुद अपने आप के कितना क़रीब आ पहुंचे ,
हम अपने आप को तेरे क़रीब लाने में।

हमारी तिशनादहानी  का कारनामा है ,
लगी हैं ओस की बूँदें नदी बनाने में।

बहुत तवील था क़िस्सा गुनाह ए अव्वल का ,
सो एक उम्र लगा दी तुम्हें सुनाने में।

हमारी बात में कुछ दिलफ़िगार शिकवे हैं,
वगरना उज्र नहीं था तुम्हें बताने में।

सजाने।  बिताने। बताने




इतना ज़ियादा ज़िंदा रहना ठीक है क्या।
हरदम यूँ ताबिन्दा रहना ठीक है क्या।

जो   होता  है   होते   रहने  देते  हो ,
क़िस्मत का कारिंदा रहना ठीक है क्या।

क्यूँ बेकार में दर्ज किया अपना क़िस्सा ,
दुनिया में आईन्दा रहना ठीक है क्या।

कितने सारे जंगल रहते हैं हम में ,
बस्ती का बाशिंदा रहना ठीक है क्या

हम मिटटी के पुतले फ़ानी  होते हैं ,
हम सब का पाईन्दा  रहना ठीक है क्या।

हर्फ़ ओ मआनी मिल कर शोर मचाते हैं ,
लफ़्ज़ों का साज़िन्दा रहना ठीक है क्या।

जो कुछ कर सकते थे कर के देखा था ,
हार के यूँ शर्मिंदा रहना ठीक है क्या।

फिर सब मस्ती का कारन भी पूछेंगे ,
हर लम्हा रक़्सिंदा रहना ठीक है क्या।

चाँद सितारे फीके लगने लगते हैं ,
इस दर्जा रख़शंदा रहना ठीक है क्या।
 


Wednesday, 27 June 2018



कैसा हंगाम उठाया था कभी।
ख़ुद को जी जान से चाहा था कभी।

ख़ामुशी चीख उठी थी डरकर ,
हमने वो शोर मचाया था कभी।

हम भी हंस हंस के मिले थे सब से ,
हमने भी सोग मनाया था कभी।

वो ही मालिक है हमारा देखो ,
जिसको मेहमान बनाया  कभी।

हमको आता है बिछड़ने का हुनर,
हमने भी साथ निभाया था कभी।

हमने हर बात बता दी सबको ,
हमने हर दाग़ छुपाया था कभी। 


तुझसे मिलने का इरादा तो नहीं करते हैं।
फिर भी मिलने पे किनारा तो नहीं करते हैं।

तुझसे मिलने तिरी महफ़िल में चले आते हैं ,
तुझसे उल्फ़त का तक़ाज़ा तो नहीं करते हैं।

सच बता यार कि हम तेरा सहारा बनकर ,
तेरी लग़ज़िश में इज़ाफ़ा तो नहीं करते हैं।

हम को तस्लीम किया जाता है मजबूरी में ,
हमको सब लोग गवारा तो नहीं करते हैं।

बस तिरा नाम लिया करते हैं दिल ही दिल में ,
तुझको हर वक़्त पुकारा तो नहीं करते हैं।

कुछ तो कहते हैं चमक कर ये सितारे हमसे ,
हमसे मिलने का इशारा तो नहीं करते हैं।

ख़ुद से  हर बात छुपाते  तो नहीं हैं फिर भी ,
ख़ुद को  हर बात बताया तो नहीं करते हैं।