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Wednesday, 2 May 2018


شور و غل  کے بعد  سناہے جاینگے 
اصلی نغمیں دشت میں گاے   جاینگے 

پہلے  ہم  کو  بزم  میں  لایا  جاےگا 
پھر  اس  کے  آداب  سکھاے  جاینگے 

کچھ دن تک مہمان نوازی  بھی ہوگی 
بام  و  در  کچھ  روز  سجاے  جاینگے 

آنکھوں کو  کچھ  دن  بہلایا  جاے گا 
سچے جھوٹے  عکس  دکھاے جاینگے 

ماضی  کا   ہر   باب    تلاشا   جاےگا 
سارے   مجرم  دار  پہ  لاے    جاینگے 

شام کے وقت بدن سے باہر نکلے ہیں 
جانے  کتنی  دور  یہ   ساے   جاینگے 

سب  کو  اصلی  بات  بتانی  ہی  ہوگی 
کب  تک  یوں  ہی  بات بناے جاینگے 
منیش 
جو ابھی تک  نہیں  کہا  کہتے 
کاش  اک  شعر  تو  نیا  کہتے 

تو ہی قصّے میں جا بجا ہوتا 
تیرا  قصّہ  ہی  جا   بجا  کہتے 

تم  تو خاموش ہو گئے مل کر 
یار  کچھ  تو   بھلا   برا  کہتے 

سب  کی  آواز  مختلف   نکلی 
ہم   کسے   اپنا   ہم نوا  کہتے 

 ایک  لمحہ  نہ  مل  سکا  ایسا 
جس کو صدیوں کا سلسلہ کہتے 

ہوش  باقی  جو   رہ  گیا  ہوتا 
تیری آنکھوں کو مے کدہ  کہتے 

کاش   بےکار  ہو   گئے  ہوتے 
سب  ہمیں کچھ تو  کام  کا کہتے 

جو  بھی  ہو  زندگی  ہماری ہے 
شرم   آتی  ہے   بد مزہ   کہتے 

اپنی  پلکیں  جھپک گیں ورنہ 
لوگ  ہم  کو  بھی  دیوتا   کہتے 
منیش 

Thursday, 22 March 2018



ناخداؤں   کی   سرپرستی  میں 
جی رہے ہیں خدا کی بستی میں 

سنگ  ساری سے در نہیں لگتا 
چوٹ کھائی ہے گل پرستی میں 

رہن  رکھنی  پڑی   ہیں  تعبیریں 
خواب دیکھا تھا تنگ  دستی میں 

ایری غیری  شراب  مت  چھونا 
فرق ہوتا ہے مہنگی سستی میں 

تیرے  چاہے   بغیر   مٹ   جائے 
اتنی  جرأت  کہاں ہے ہستی میں 

لوگ  پتھر  کے  ہو گئے  دیکھو 
اتنا  ڈوبے  ہیں  بت  پرستی میں 

جب  سے  آتش  فروش اے ہیں 
آگ  لگنے  لگی  ہے  بستی میں 

چلتے چلتے نکل گئے خود سے 
ہم  بھی  دیوانگی کی مستی میں 

اب    تو   ہم  کو  عروج  پر   لاؤ 
کب سے ڈوبے ہوئے ہیں پستی میں 
منیش شکلا 


Tuesday, 6 March 2018



بعض   اوقات   بھی   نہیں   کرتے 
اب  تری   بات  بھی   نہیں   کرتے 

ایک  تو  دھوپ  چھین لی اس  پر 
ابر   برسات    بھی   نہیں    کرتے 

اب    کوئی    اجنبی    نہیں   لگتا 
اب   ملاقات    بھی    نہیں   کرتے 

کتنا  کچھ  بھر گیا ہے سینے میں 
اور   ہم  بات   بھی    نہیں   کرتے 

ہم   اگر تجھ  سے بد گماں   ہو تے 
تو   سوالات    بھی   نہیں    کرتے 

وہ   ہی   سارے  فساد کی جڈ ہیں 
اور  فسادات   بھی    نہیں   کرتے 

شب  کی  تنہائیوں  کی خواہش  ہے 
دشت   میں  رات  بھی  نہیں  کرتے 

منیش شکلا 

Monday, 5 February 2018


اس  سے  ملنا     محال    تھا   اپنا 
ہجر   جیسا     وصال      تھا    اپنا 

وہ بھی رویا نہیں تھا  برسوں سے 
اس  کے  جیسا  ہی  حال   تھا اپنا 

سیدھے سیدھے  جواب  دے  دیتے 
سیدھا    سادہ     سوال    تھا  اپنا 

تیری  قربت میں آ کے  ہنستے ہیں 
ورنہ   ہم    کو    ملال    تھا   اپنا 

اس کے جاتے ہی بجھ گیا سب کچھ 
اس  کے  دم  سے  جلال  تھا  اپنا 

ہم نے جی بھر کے   چاندنی  چکھی 
اپنی   چھت   تھی    ہلال   تھا  اپنا 

بات  بھی  معرکہ   کی  کہتے تھے 
اس   پہ    لہجہ    کمال    تھا  اپنا 

ہم کو  جانا تھا اب بھی میلوں تک 
جسم  تھک   کر   نڈھال   تھا  اپنا 

وہ  اندھیرے  میں  ہی  گیا  اٹھ کر 
اس    کو   اتنا    خیال   تھا   اپنا 


منیش شکلا 

Wednesday, 31 January 2018




सीने में  उम्मीद का  सूरज  और  आँखों  में  पानी   है। 

बदलेंगे  तस्वीर  ज़माने   की   ये   दिल  में  ठानी   है। 

हमने  इक ख़ुशहाल चमन का ख़्वाब सुनहरा देखा  है ,

हमको हर इक फूल की रंगत फिर वापस लौटानी है। 


साहिल से मुस्कुरा के तमाशा न देखिये,

हमने ये ख़स्ता नाव विरासत में पाई है।



बारिश के इंतज़ार में सदियां गुज़र गयीं ,

उट्ठो  ज़मीं को चीर के पानी निकाल लो। 


हर एक ज़र्रे के रुख़ पर निखार आने तक ,
उदास बाग़ के दिल को क़रार आने तक ,
चमन का फूल का रंगों का तब्सरा होगा ,
कुछ इंतज़ार तो करिये बहार आने तक 

शहर के अंधेरे को  इक चराग़ काफ़ी है,

सौ चराग़ जलते हैं  इक चराग़ जलने से।

ज़मीं के ख़ार चुनने से चमन में फूल आने तक। 
हमीं मिलते रहे हैं ख़ाक में पतझड़ के जाने तक। 
हमारी बाग़बानी पर वही उंगली उठाते हैं ,
कि जिनको बाग़ से मतलब रहा ख़ुश्बू चुराने तक।  

मेरे जुनूं का नतीजा ज़रूर निकलेगा।

इसी सियाह समंदर से नूर निकलेगा।


न हमसफ़र  न किसी  हमनशीं से निकलेगा।

हमारे पाओं  का  कांटा  हमीं  से  निकलेगा।


तमाम    राह     तुम्हें     बारहा     रुलाएंगे।
सफ़र  के  सारे    मक़ामात   याद    आएंगे।
ये जिनकी रौशनी तुमको अखर रही है अभी ,


यही     चराग़    तुम्हें    रास्ता     दिखाएंगे।

Wednesday, 17 January 2018



اس  سے  ملنا     محال    تھا   اپنا 
ہجر   جیسا     وصال      تھا    اپنا 

وہ بھی رویا نہیں تھا  برسوں سے 
اس  کے  جیسا  ہی  حال   تھا اپنا 

سیدھے سیدھے  جواب  دے  دیتے 
سیدھا    سادہ     سوال    تھا  اپنا 

تیری  قربت میں آ کے  ہنستے ہیں 
ورنہ   ہم    کو    ملال    تھا   اپنا 

اس کے جاتے ہی بجھ گیا سب کچھ 
اس  کے  دم  سے  جلال  تھا  اپنا 

ہم نے جی بھر کے   چاندنی  چکھی 
اپنی   چھت   تھی    ہلال   تھا  اپنا 

بات  بھی مارکہ   کی  کہتے تھے 
اس   پہ    لہجہ    کمال    تھا  اپنا 

ہم کو  جانا تھا اب بھی میلوں تک 
جسم  تھک   کر   نڈھال   تھا  اپنا 

وہ  اندھیرے  میں  ہی  گیا  اٹھ کر 
اس    کو   اتنا    خیال   تھا   اپنا 
منیش شکلا