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Monday, 5 February 2018


اس  سے  ملنا     محال    تھا   اپنا 
ہجر   جیسا     وصال      تھا    اپنا 

وہ بھی رویا نہیں تھا  برسوں سے 
اس  کے  جیسا  ہی  حال   تھا اپنا 

سیدھے سیدھے  جواب  دے  دیتے 
سیدھا    سادہ     سوال    تھا  اپنا 

تیری  قربت میں آ کے  ہنستے ہیں 
ورنہ   ہم    کو    ملال    تھا   اپنا 

اس کے جاتے ہی بجھ گیا سب کچھ 
اس  کے  دم  سے  جلال  تھا  اپنا 

ہم نے جی بھر کے   چاندنی  چکھی 
اپنی   چھت   تھی    ہلال   تھا  اپنا 

بات  بھی  معرکہ   کی  کہتے تھے 
اس   پہ    لہجہ    کمال    تھا  اپنا 

ہم کو  جانا تھا اب بھی میلوں تک 
جسم  تھک   کر   نڈھال   تھا  اپنا 

وہ  اندھیرے  میں  ہی  گیا  اٹھ کر 
اس    کو   اتنا    خیال   تھا   اپنا 


منیش شکلا 

Wednesday, 31 January 2018




सीने में  उम्मीद का  सूरज  और  आँखों  में  पानी   है। 

बदलेंगे  तस्वीर  ज़माने   की   ये   दिल  में  ठानी   है। 

हमने  इक ख़ुशहाल चमन का ख़्वाब सुनहरा देखा  है ,

हमको हर इक फूल की रंगत फिर वापस लौटानी है। 


साहिल से मुस्कुरा के तमाशा न देखिये,

हमने ये ख़स्ता नाव विरासत में पाई है।



बारिश के इंतज़ार में सदियां गुज़र गयीं ,

उट्ठो  ज़मीं को चीर के पानी निकाल लो। 


हर एक ज़र्रे के रुख़ पर निखार आने तक ,
उदास बाग़ के दिल को क़रार आने तक ,
चमन का फूल का रंगों का तब्सरा होगा ,
कुछ इंतज़ार तो करिये बहार आने तक 

शहर के अंधेरे को  इक चराग़ काफ़ी है,

सौ चराग़ जलते हैं  इक चराग़ जलने से।

ज़मीं के ख़ार चुनने से चमन में फूल आने तक। 
हमीं मिलते रहे हैं ख़ाक में पतझड़ के जाने तक। 
हमारी बाग़बानी पर वही उंगली उठाते हैं ,
कि जिनको बाग़ से मतलब रहा ख़ुश्बू चुराने तक।  

मेरे जुनूं का नतीजा ज़रूर निकलेगा।

इसी सियाह समंदर से नूर निकलेगा।


न हमसफ़र  न किसी  हमनशीं से निकलेगा।

हमारे पाओं  का  कांटा  हमीं  से  निकलेगा।


तमाम    राह     तुम्हें     बारहा     रुलाएंगे।
सफ़र  के  सारे    मक़ामात   याद    आएंगे।
ये जिनकी रौशनी तुमको अखर रही है अभी ,


यही     चराग़    तुम्हें    रास्ता     दिखाएंगे।

Wednesday, 17 January 2018



اس  سے  ملنا     محال    تھا   اپنا 
ہجر   جیسا     وصال      تھا    اپنا 

وہ بھی رویا نہیں تھا  برسوں سے 
اس  کے  جیسا  ہی  حال   تھا اپنا 

سیدھے سیدھے  جواب  دے  دیتے 
سیدھا    سادہ     سوال    تھا  اپنا 

تیری  قربت میں آ کے  ہنستے ہیں 
ورنہ   ہم    کو    ملال    تھا   اپنا 

اس کے جاتے ہی بجھ گیا سب کچھ 
اس  کے  دم  سے  جلال  تھا  اپنا 

ہم نے جی بھر کے   چاندنی  چکھی 
اپنی   چھت   تھی    ہلال   تھا  اپنا 

بات  بھی مارکہ   کی  کہتے تھے 
اس   پہ    لہجہ    کمال    تھا  اپنا 

ہم کو  جانا تھا اب بھی میلوں تک 
جسم  تھک   کر   نڈھال   تھا  اپنا 

وہ  اندھیرے  میں  ہی  گیا  اٹھ کر 
اس    کو   اتنا    خیال   تھا   اپنا 
منیش شکلا 


Tuesday, 26 December 2017



گزاری   عمر   پیالہ  و  مے   بنانے  میں 
 پھر  ہم نے آگ لگا دی شراب  خانے  میں 

خود   اپنے  آپ کو ہم  دیکھ ہی نہیں  پاے 
ہمارا   دھیان   لگا  ہی  رہا    زمانے  میں 

سب اپنے آپ کو ڈھونڈھا کئے بہر صورت 
ہم  اپنی  داستاں  کہتے  رہے  فسانے میں 

تمھاری  یاد  ستاے گی   عمر   بھر  ہم   کو 
ذرا  سا  وقت  لگے گا  تمھیں بھلانے میں 

یوں  ایک  پل  میں زمیندوز مت کرو ہم کو 
ہزاروں  سال  لگے  ہیں  ہمیں  بنانے میں 

خود  اپنے  آپ  کے  کتنا  قریب  آ  پہنچے 
ہم  اپنے  آپ  کو  تیرے  قریب  لانے  میں 

ہماری   تشنہ    دہانی    کا    کارنامہ   ہے 
لگی  ہیں اوس کی بوندیں ندی بنانے میں 

ہماری   داستاں  کتنی  طویل   تھی  دیکھو 
تبھی  تو  دیر  لگائی  تمھیں  سنانے  میں 

منیش شکلا 

Monday, 25 December 2017



गुज़ारी  उम्र  पियाला   ओ  मय  बनाने  में। 
फिर हमने  आग  लगा  दी  शराबख़ाने में। 

ख़ुद अपने आप  को हम  देख ही नहीं पाए ,
हमारा  ध्यान  लगा   ही   रहा  ज़माने   में। 

सब  अपने  आप को  ढूंढ़ा किए बहरसूरत ,
हम  अपनी  दास्ताँ  कहते  रहे  फ़साने में। 

तुम्हारी  याद   सताएगी   उम्र  भर  हमको ,
ज़रा   सा  वक़्त   लगेगा   तुम्हें   भुलाने  में। 

यूँ  एक  पल में  ज़मींदोज़  मत करो हमको ,
हज़ारों   साल    लगे   हैं    हमें   बनाने   में। 

ख़ुद अपने आप के कितना क़रीब आ पहुंचे ,
हम  अपने  आप  को  तेरे   क़रीब  लाने  में।

हमारी   तिश्ना   दहानी    का   कारनामा   है ,
लगी   हैं   ओस  की   बूँदें   नदी   बनाने  में। 

हमारी  दास्ताँ   कितनी   तवील   थी  देखो ,
तभी   तो   देर    लगाई    तुम्हें   सुनाने   में। 
मनीष शुक्ला 


Wednesday, 15 November 2017


دل  برہم  کی  خاطر  مدّعا   کچھ   بھی  نہیں  ہوتا 
 عجب  حالت ہے اب شکوہ  گلا کچھ بھی نہیں ہوتا 

کوئی  صورت ابھرتی ہے نہ میں مسمار ہوتا ہوں 
میں  وہ پتھر کہ جسکا فیصلہ کچھ بھی نہیں ہوتا 

کسی  کو  ساتھ  لے لینا  کسی  کے ساتھ  ہو لینا 
فقیروں  کے  لئے  اچھا  برا  کچھ بھی نہیں ہوتا 

کبھی چلنا مرے  آگے  کبھی  رہنا  مرے  پیچھے  
 رہ  الفت  میں چھوٹا  یا  بڑا  کچھ بھی نہیں ہوتا 

کبھی  دل  میں مرے تیرے سوا ہر بات ہوتی ہے 
کبھی دل میں مرے تیرے سوا کچھ بھی نہیں ہوتا 

وہی  ٹوٹی  ہوئی  کشتی  وہی  پاگل  ہوائیں  ہیں 
ہمارے  ساتھ  دنیا  میں  نیا کچھ بھی نہیں ہوتا 

یہ سودا ہے نگاہوں کا تجارت دل کی ہے لیکن 
محبّت  میں  خسارہ  فایدہ  کچھ  بھی نہیں ہوتا 

کبھی  دو  چار قدموں کا سفر طے ہو  نہیں پاتا 
کبھی میلوں سے لمبا فاصلہ کچھ بھی نہیں ہوتا 

فقط   کردار  کا  مارا ہوا   ہے   ہر   بشر  ورنہ 
کوئی  انسان  اچھا  یا  برا  کچھ بھی  نہیں  ہوتا 

فلک  پر   ہی  ستاروں  کا  کوئی عنوان  ہوتا  ہے 
کسی    ٹوٹے ستارے  کا پتا  کچھ  بھی نہیں ہوتا 

بھلے خواہش کروں تیری کسی بھی شکل میں لیکن 
مرا   مقصد  پرستش  کے سوا کچھ بھی نہیں ہوتا 

اگر دیکھوں تو خامی ہی دکھائی دے ہر اک شے میں 
اگر سوچوں تو خود  سے بدنما  کچھ بھی  نہیں ہوتا 

بظاھر  عمر  بھر  یوں  تو  ہزاروں کام  کرتے ہیں 
حقیقت  میں  مگر  ہمنے  کیا کچھ  بھی  نہیں ہوتا 

منیش شکلا 


جب   آسمان   کا  سمجھے  نہیں  اشارہ   تم 

تو پھر زمیں  کو کہاں رہ  سکے  گوارا   تم 


تمہاری خلق   کا   سب   سے  حقیر ذرّہ  ہم 

ہمارے  چرخ   کا سب سے  حسیں ستارہ  تم 


اب  اس  کے  بعد  ہمیں  دید کی  نہیں حاجت 

نظر  کے  واسطے  ہو   آخری    نظارہ   تم 


بڑھا  کے  قربتیں    بیمار   کر  دیا   ہم   کو 

اب  آ کے  حال  بھی   پوچھو  کبھی ہمارا تم 


تمھاری  آگ  میں   جلتے  ہوئے  سراپا  ہم 

ہماری   راکھ  سے  اٹھتا    ہوا   شرارہ  تم 


تمھاری  بات  پہ  ہم  کو  ہنسیں سی آتی ہے 

ہمارا   حال    نہ    پوچھا   کرو   خدارا  تم 


ہمارا  ساتھ   بہت   معتبر  نہیں   پھر  بھی 

ہمارے  ساتھ  میں  کرتے  رہو  گزارہ   تم 

منیش شکلا