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Saturday, 1 October 2011

ishq ke dard ka chara akhir kiske bas mei'n hota hai

इश्क़ के दर्द का चारा आख़िर किसके बस में होता है.
जो पहले दिल में होता था अब नस नस में  होता  है .,

उड़ने   के  अरमान   सभी  के  पूरे  कब  हो  पाते  हैं.
उड़ने  का  अरमान  अगरचे  हर  बेकस  में  होता है.,

चाँद सितारों पर रहने की ख्वाहिश अच्छी है लेकिन.
चाँद  सितारों  पर रह  पाना  किसके बस  में होता है.,

एक   इरादा  कर  के  घर  से  चलने   में  है   दानाई.
लोगों  का  नुक़सान  हमेशा  पेश  ओ  पस  में होता है.,

रिश्तों की बुनियाद कहाँ हिलती है फिर अफ़वाहों से.
पुखता  पाएदार   भरोसा  जब  आपस  में  होता   है.,

प्यार की पहली बारिश में भी है बिलकुल वैसा जादू.
जैसा  जादू  भीनी  भीनी  मुश्क   ए  खस  में होता है.,

मेरे  जैसा  लोहा   आख़िर  सोने  में  तब्दील   हुआ.
तुझमे  शायद वो  सब कुछ  है  जो पारस में  होता है.,

उस से  बातें  करने  में  सब  खौफ़  हवा  हो  जाते हैं.
किस दरजा पुरजोर दिलासा इक ढाढस   में होता है.,
मनीष शुक्ल 

Friday, 30 September 2011

mehv e yaas qamar lagta hai

 महव  ए  यास  क़मर  लगता है.
 होगी   नहीं    सहर   लगता   है.,

क्यूँ   परवाज़  हुई   है   मुश्किल.
टूट    गए   हैं   पर    लगता   है.,

आदी   हूँ   मैं   इक  रहबर   का.
तन्हा   चलते    डर   लगता   है,.

उम्र    गई     है    चलते   चलते.
अब   रस्ता  ही   घर  लगता  है,.

तुम अखलाक़ को मिट्टी समझो.
हम  को    तो   ज़ेवर  लगता  है,.

पहले    आंसू   दो   मिट्टी   को.
उसके   बाद    शजर  लगता  है,.

जाने    कैसे   बिछड़   गए   हम.
लग  गई  यार  नज़र  लगता है,.
मनीष शुक्ल 



Thursday, 22 September 2011

akhiri koshish bhi karke dekhte





आख़िरी  कोशिश  भी   कर  के  देखते।
फिर   उसी   दर  से   गुज़र  के   देखते।



गुफ़्तगू   का   कोई   तो   मिलता  सिरा,
फिर   उसे   नाराज़   कर   के    देखते।



काश   जुड़   जाता   वो   टूटा   आईना,
हम  भी  कुछ  दिन  बन संवर  के देखते।



रहगुज़र ही  को   ठिकाना  कर   लिया,
कब  तलक   हम  ख़्वाब  घर के  देखते।



काश  मिल  जाता   कहीं  साहिल  कोई,
हम  भी   कश्ती   से  उतर  के   देखते।


हो   गया    तारी   संवरने   का   नशा,
वरना  ख़्वाहिश  थी  बिखर के  देखते।


दर्द   ही   गर  हासिल   ए  हस्ती  है  तो,
दर्द  की   हद   से   गुज़र   के   देखते।
मनीष शुक्ल

Monday, 19 September 2011

raat ke dard ka mara nikla





रात  के दर्द  का  मारा निकला।
चाँद  भी  पारा  पारा निकला


आप  समंदर   की   कहते   हैं,
दरिया तक  तो  खारा निकला


ऊबा  दुनिया   की  हर   शै  से,
दिल आख़िर  बंजारा  निकला



आग  न  दरबारों   तक   पहुंची,
मुख़बिर  एक  शरारा निकला



सूरज   के  आने   तक  चमका,
बाग़ी  एक   सितारा  निकला

पलटे  दिल  के   सफ़हे   सारे,
सब  पर  नाम तुम्हारा निकला

जो समझा था ख़ुद को नाज़िर,
वो  भी  एक   नज़ारा  निकला

मनीष शुक्ल

ankhon dekhi baat hai koi jhoot nahi'n

आँखों  देखी बात है  कोई  झूट  नहीं.
चोट  लगाकर  कहते हैं  तू रूठ  नहीं,.
ख़ुद  ही  भरते  जाते  हैं  गुब्बारे  को.
और  फिर  कहते हैं गुब्बारे फूट  नहीं,.
पत्थर  लेकर  बैठे   हैं   इल्जामों   के.
और  शीशे  से  कहते हैं  तू टूट  नहीं,.
अब की बार उजड़कर बसना मुश्किल है.
दिल की बस्ती को इस दरजा लूट नहीं,.
प्यार  मुहब्बत   की  पेचीदा  राहों  पर.
सच तो चल सकता है लेकिन झूट नहीं,.
दिल  के  पोशीदा  हिस्सों पर चोट करे.
हर  ऐरे  गैरे  को   इतनी  छूट   नहीं,.
अभी  बहुत  से  परदे  उठने  बाकी  हैं.
 मेरी  उम्मीद  अभी  से  टूट  नहीं,.मनीष शुक्ल

Friday, 16 September 2011

kaghazo'n par muflisi ke morche sar ho gaye



काग़ज़ों  पर  मुफ़लिसी  के  मोर्चे सर हो   गए
और  कहने  के  लिए  हालात   बेहतर हो गए 



प्यास की  शिद्दत के मारों की अज़ीयत देखिये
ख़ुश्क  आँखों  में नदी के ख़्वाब पत्थर हो गए 



ज़र्रा  ज़र्रा खौफ़  में  हैगोशा गोशा  जल रहा
अब के   मौसम  के  न जाने कैसे  तेवर हो गए



सबके सब  सुलझा रहे हैं आसमां की गुत्थियाँ
मसअले  सारे   ज़मीं  के  हाशिये पर  हो  गए


 इक बगूला देर  से  नज़रों  में  है ठहरा हुआ
गुम  कहाँ  जाने  वो सारे सब्ज़  मंज़र  हो  गए


फूल अब करने लगे हैं  ख़ुदकुशी का  फैसला
बाग़ के  हालात  देखो कितने  अबतर हो  गए



हमने तो पास ए अदब  में बंदापरवर कह दिया
और वो समझे  कि सच  में बंदापरवर हों  गए 

मनीष शुक्ल

jeene ki yaiyyari chhod



जीने  की   तैय्यारी  छोड़.

यार  मिरे   हुश्यारी  छोड़,


सीधे अपनी  बात  पे आ,

ये  लहजा  दरबारी  छोड़।


या दुनिया का  खौफ़ हटा.

 या  फिर हमसे यारी छोड़। 


 चेहरा   गुम  हो   जायेगा,

ख़ुद  से ये  अय्यारी छोड़।


दीवानों  से   हाथ  मिला,

प्यारे  दुनियादारी   छोड़। 


लौट  के घर  भी जाना है,

मनसब तख़्त सवारी छोड़। 


अपने  दिल   से   पूछ   ज़रा,

चल  तू  बात  हमारी    छोड़। 

मनीष शुक्ल 

jeene ki yaiyyari chhod

जीने  की  तैय्यारी  छोड़.
यार  मिरे  हुश्यारी  छोड़,

सीधे अपनी  बात  पे आ.
ये  लहजा  दरबारी  छोड़,

या दुनिया का  खौफ़ हटा.
या फिर हमसे यारी छोड़,

चेहरा   गुम  हो   जायेगा.
ख़ुद  से ये  अय्यारी छोड़,

दीवानों  से   हाथ  मिला.
प्यारे  दुनियादारी   छोड़,

लौट  के  घर  भी जाना है.
मनसब तख़्त सवारी छोड़,
मनीष शुक्ल 

Wednesday, 14 September 2011

tiri roshni mei'n nahane lage hai'n

तिरी  रौशनी  में  नहाने   लगे  हैं.
मिरे लफ्ज़ अब  जगमगाने लगे  हैं,

मिरे  रतजगों  से   परेशान   होकर.
सितारे  कहानी  सुनाने   लगे   हैं,

ख़यालों  की  परवाज़  बढ़ने लगी है.
ख़लाओं  से  पैग़ाम  आने  लगे  हैं,

क़मर ने ख़ुदा जाने क्या कह दिया है.
समंदर  के  लब  थरथराने  लगे  हैं,

तिरा  दर्द  अब जाविदाँ हो  चला  है.
कि  दिन  रात हम मुस्कराने  लगे हैं,

सफ़र ख़ाक में  मिलने वाला है शायद.
मुसाफ़िर  बगूले   उड़ाने  लगे   हैं,

तमाशे  की  अब  इन्तेहा हो रही है.
तमाशाई  उठ  उठ  के जाने लगे हैं,
मनीष शुक्ल

ik andhi daud thi ukta gaya tha




इक  अंधी  दौड़  थी  उकता  गया  था 
मैं  ख़ुद  ही  सफ़  से बाहर आ गया था

फ़क़त  अब  रेत  की  चादर  बिछी  है
सुना  है  इस   तरफ़  दरिया  गया  था 

न दिल  बाज़ार  में  उसका  लगा फिर
जिसे  घर   का पता  याद आ  गया था

उसी  ने  राह   दिखलाई   जहाँ   को
जो  अपनी  राह   पर  तन्हा गया  था

उसी  सर  की क़यादत  में  है  दुनिया,
कभी   नेज़े   पे  जो   रक्खा  गया  था

कोई   तस्वीर  अश्कों   से    बनाकर
फ़सील ए शहर   पे  चिपका  गया  था

समझ  आख़िर में  आया  वाहिमा  था
जो कुछ अब तक सुना समझा गया था,
मनीष शुक्ल