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Wednesday, 14 September 2011

ik andhi daud thi ukta gaya tha




इक  अंधी  दौड़  थी  उकता  गया  था 
मैं  ख़ुद  ही  सफ़  से बाहर आ गया था

फ़क़त  अब  रेत  की  चादर  बिछी  है
सुना  है  इस   तरफ़  दरिया  गया  था 

न दिल  बाज़ार  में  उसका  लगा फिर
जिसे  घर   का पता  याद आ  गया था

उसी  ने  राह   दिखलाई   जहाँ   को
जो  अपनी  राह   पर  तन्हा गया  था

उसी  सर  की क़यादत  में  है  दुनिया,
कभी   नेज़े   पे  जो   रक्खा  गया  था

कोई   तस्वीर  अश्कों   से    बनाकर
फ़सील ए शहर   पे  चिपका  गया  था

समझ  आख़िर में  आया  वाहिमा  था
जो कुछ अब तक सुना समझा गया था,
मनीष शुक्ल

2 comments:

  1. .

    उसी ने राह दिखलाई जहाँ को.
    जो अपनी राह पर तन्हा गया था,
    उसी सर की क़यादत में है दुनिया.
    कभी नेज़े पे जो रक्खा गया थ.....

    Outstanding creation !

    .

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