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Tuesday, 13 September 2011

khud ko itna khwar n kar





ख़ुद को इतना ख्वार न कर
समझौता  हर  बार   न कर

ग़म  का  कारोबार न  कर
जज़्बों  को  बेकार   कर

अपनों   की    रुसवाई   है
ख़ुद को यूँ अख़बार न कर

रिश्तों में भी  सूद ओ ज़ियाँ
घर को  तू  बाज़ार  न कर

ख़ुदगर्ज़ी    आ     जाएगी
ख़ुद से इतना  प्यार  न कर

तेरे   दिल   में  ख़दशा   है
अब तू  दरिया  पार  न कर

सर पर  भी गिर सकता  है
हर बुत को  मिस्मार न कर

लफ़्ज़ों  का मफ़हूम  समझ
लहजे  पर  तकरार  न  कर
मनीष शुक्ल

2 comments:

  1. मनीष भैया .....
    एक खुबसूरत गजल का नगीना
    ग़म का कारोबार न कर.
    जज़्बों को बेकार न कर,

    बधाई स्वीकारें .......

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