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Saturday, 16 July 2016




आदरणीय श्री उदयप्रताप सिंह जी के कवि रूप से मेरा परिचय काफ़ी पुराना है। उनको बहुत छुटपन से कवि सम्मेलनों और मुशायरों में सुनते  रहने का सौभाग्य मुझे प्राप्त है। उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलने का मौक़ा लगभग तीन बरस पहले मिला जब एक मुशायरे के सिलसिले में मुझे मुम्बई जाना था। मुशायरे के कन्वीनर का फ़ोन मेरे पास आया कि जनाब उदयप्रताप सिंह साहब भी मुशायरे में शिरकत करने मुम्बई जा रहे हैं और मुझे उनके साथ जाना होगा।मुझे उनका मोबाइल  नंबर इस ताक़ीद के साथ दिया गया कि मैं उनसे बात करके सभी इंतेज़ामात देख लूँ। ख़ैर , मैंने डरते डरते श्री उदयप्रताप जी को फ़ोन लगाया और एक खूबसूरत और नफ़ीस आवाज़ से मेरी मुलाक़ात हुई। बात हुई और साथ जाने की बात तै हो गयी। टिकट्स एक ही फ्लाइट में बुक करना तै हुआ और एयरपोर्ट पर मुलाक़ात की बात के साथ बात ख़त्म हुई। बात करने के बाद मुझे अहसास हुआ कि इतना क़द्दावर शख़्स  किस दरजा मुख़लिस और सादा है ,मुझे बहुत संकोच हो रहा था कि इनके साथ सफ़र पता नहीं कैसा रहेगा ?ये भी ज़ेहन में आ रहा था कि उनको कोई परेशानी पेश आई तो कैसे सम्भाला जाएगा वग़ैरह वग़ैरह। फिर वो दिन आया जब हम लोग एक साथ मुंबई की फ्लाइट में बैठे और लगभग ढाई घंटा साथ रहे। सफ़र के दौरान मुझे बख़ूबी मालूम हो गया कि मैं आज के हिन्दोस्तान के एक शानदार कवि और शायर तथा एक अज़ीम शख़्सियत से रूबरू हूँ। व्यक्तिगत रूप से राजनीतिक जीवन से जुड़े साहित्यकारों के बारे में मेरी राय बहुत मयारी  नहीं रही है ,ख़ासतौर पर उनके साहित्यिक स्तर  और जीवन दृष्टि  को लेकर। लेकिन श्री उदयप्रताप जी को देख के मालूम हुआ कि राजनीतिक जीवन में रहकर भी कैसे कमल की तरह निष्कलंक और सरल रहा जा सकता है।
मेरा सौभाग्य ये रहा की श्री उदयप्रताप जी से उस मुशायरे के बाद कई मुशायरों में मुलाक़ात हुई और हर बार मैं खुद को उनके निकटतर पाता  गया।  उन्होंने भी अपना निश्छल प्रेम मुझ पर न्योछावर किया। ईश्वर  की लीला ये रही कि  इसी दौरान मुझे शासन द्वारा उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ का अतिरिक्त कार्यभार दे दिया गया।  मेरे कार्यभार ग्रहण  करने के कुछ समय पश्चात निदेशक हिंदी संस्थान की सेवानिवृत्ति के बाद निदेशक के पद का  कार्यभार भी शासन ने मुझे ही सौंप दिया जिसकी वजह से श्री उदयप्रताप जी के साथ मैं शासकीय रूप से भी जुड़ गया।
 श्री उदयप्रताप जी के साथ बिताया गया ये वक़्त मेरे लिए बहुत क़ीमती  है। मैं खुद को सौभाग्यशाली समझता  हूँ कि मुझे उनको इतने क़रीब से देखने ,जानने, सुनने और उनसे कुछ सीखने का मौक़ा मिला । इतना पढ़ा लिखा खांटी कवि ,ख़ालिस शायर ,खूबसूरत शख्सियत का मालिक, सरल, निष्कपट, सहृदय ,विद्वान ,तीक्ष्ण बुद्धि , मंजा  हुआ राजनीतिज्ञ , सृजनात्मक व्यक्तित्व का धनी  ,चिंतक,विचारक , इंसान बिरले ही नज़र में आता है। बाइबिल में लिखा है कि मेरे राज्य में वो प्रवेश करेंगे जो बच्चों जैसे हैं। श्री उदयप्रताप जी को देख कर उस बात पर यक़ीन करने को दिल चाहता है। उनको देख के लगता यूँ है जैसे  वो सदैव स्वर्गिक आनंद में रहते हैं। कभी क्रोध ,उद्दिग्नता या नैराश्य का भाव उनमें नज़र नहीं आता। हर वक़्त एक बालसुलभ मुस्कान उनके चेहरे पे खेलती रहती है। उनके पास आकर तुरंत ऐसा अहसास होता है जैसे कड़ी धूप  में अचानक आप किसी  बरगद के नीचे आ जाएं। उनकी बातें सुनिए तो सुनते चले जाइए। स्मरण शक्ति ऐसी कि आप हतप्रभ रह जाइए। अपनी और दूसरे कवियों और शायरों  की सैंकड़ों पंक्तियां इन्हें मुंह ज़बानी याद हैं। विशुद्ध कविता से प्रेम उनका मूल भाव है। सामाजिक सरोकारों पर गहरी नज़र ,उनकी समझ और उनके हल सब उदयप्रताप जी के सामने सदा स्पष्ट रहते हैं। वे हिन्दोस्तान की मिली जुली  संस्कृति के पक्षधर हैं और साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए हमेशा प्रयासरत रहते हैं। साथ ही हिंदी और उर्दू भाषा के बीच की दूरी उनकी चिंता और दुःख का कारण  है। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में उनका सेवाकाल संस्थान के स्वर्णकालों में से एक सिद्ध होगा ये मेरा विश्वास है। पिछले चार वर्षों में उन्होंने संस्था को जो ऊंचाइयां बख़्शी हैं वो क़ाबिल ए तारीफ़ है।    उनको जानकार ,उनसे बातें करके ज़िन्दगी और जीवन मूल्यों पर भरोसा मज़बूत होता है और सच पर टिके रहने की शक्ति प्राप्त होती है। उनकी ज़िन्दगी से जुड़ी छोटी बड़ी अनेक घटनाएं हैं जिनसे उनका जुझारू, सत्यप्रेमी और निर्भीक स्वरुप उभरकर सामने आता है।श्री उदयप्रताप जी सच मायनों में एक आदमक़द शख़्सियत हैं।
उदयप्रताप जी की कविता पर मैंने ज़्यादा कुछ नहीं कहा क्यूंकि उसपर बहुत कुछ कहा जा चुका है और मैं ख़ुद को इस लाएक़ नहीं समझता हूँ कि उनकी कविता पर आलोचनात्मक पंक्तियां लिख सकूं। बस मैं ये कह सकता हूँ कि मुझे उनके गीत और कवितायेँ बहुत पसंद हैं। ख़ास तौर पर छन्द पर उनकी पकड़ तो अद्भुत है। कठिन से कठिन विषय और बिम्ब उनकी कविता में इतनी आसानी से शक्ल लेते जाते हैं कि हैरत होती है।
श्री उदयप्रताप जी के बारे में जितना लिखा कहा जाये वो कम होगा, मैं उनके ऊपर अभी कई सफ़हे लिख सकता हूँ लेकिन शायद फ़िलहाल इसकी गुंजाइश नहीं है। इश्वर ने मौक़ा दिया तो बहुत सी और बातें उनके बारे में की जाएंगी।  फ़िलहाल ईश्वर से प्रार्थना है कि वो उदयप्रताप जी को स्वस्थ रखे और शतायु करे ताकि हिन्दोस्तानी कविता और समाज को उसका सरपरस्त बरसों बरस हासिल रहे।
मनीष शुक्ल 

Tuesday, 5 July 2016




सर  ओ  सामानियों  में  जी  रहे  हो। 
बड़ी     अर्ज़ानियों    में   जी  रहे  हो। 

बड़ी  तकलीफ़ से गुज़रोगे इक दिन ,
बहुत  आसानियों  में   जी   रहे   हो। 

ये  दुनिया  है  यहां  ऐसा   ही   होगा ,
अबस  हैरानियों    में   जी    रहे   हो। 

कोई   तो  नाम  दे  दो  ज़िन्दगी  को ,
क्यूँ   बेउन्वानियों   में   जी   रहे  हो। 

मुहब्बत,  बंदगी , पास  ए  अक़ीदत ,
ये  किन  नादानियों  में  जी  रहे  हो। 

अभी  शादाब  लगता  है  सभी कुछ ,
अभी  तुग़यानियों  में   जी   रहे   हो। 

चलो   सहरा  में चलके ग़ुल मचाओ ,
ये  किन  वीरानियों  में  जी  रहे  हो। 

न   तैरा  जाए   है   तुमसे   न   डूबा ,
ये   कैसे  पानियों  में   जी   रहे   हो। 

असीरी  से जो नावाक़िफ़ हैं अपनी ,
तुम  उन ज़िन्दाँनियों  में जी रहे हो। 
मनीष शुक्ला 




Monday, 4 July 2016




سر  و سامانیوں  میں جی  رہے ہو 
بڑی   ارزانیوں  میں  جی  رہے  ہو 

بڑی  تکلیف سے گزروگے اک  دن 
بہت  آسانیوں  میں  جی   رہے   ہو 

یہ    دنیا  ہے  یہاں  ایسا  ہی   ہوگا 
عبث   حیرانیوں  میں  جی  رہے  ہو 

کوئی   تو  نام   دے   دو  زندگی  کو 
کیوں بے عنوانیوں میں جی رہے ہو 

محبّت      بندگی      پاس     عقیدت 
یہ  کن  نادانیوں  میں  جی  رہے  ہو 

ابھی  شاداب  لگتا ہے  سبھی  کچھ 
ابھی  طغیانیوں  میں  جی  رہے   ہو 

چلو  صحرا  میں  چل کے غل مچاؤ  
یہ  کن  ویرانیوں  میں  جی رہے ہو 

نہ  تیرا  جائے  ہے  تمسے نہ ڈوبا 
یہ  کیسے  پانیوں میں جی رہے  ہو 

اسیری  سے  جو  نا واقف  ہیں اپنی 
تم  ان  زندانیوں  میں جی  رہے ہو 
منیش شکلا 



नेकी   बदी  में   पड़  के   परेशान  हो  गया। 
दिल   कारोबार  ए  ज़ीस्त में हैरान हो  गया। 

जाती   बहार   ले   गई   सब्ज़ा  दरख़्त    का ,
दौर    ए  खिज़ां  में  टूटना  आसान हो  गया। 

कैसी   अजीब     बस्तियां   तामीर   हो   गईं ,
ये    क्या  हुआ कि शहर बियाबान हो  गया। 

उम्मीद का खंडर था जो दिल में वो ढह गया ,
ये  दश्त  आज  ठीक  से   वीरान   हो   गया। 

इक ज़ख़्म का चराग़ था रौशन वो बुझ गया ,
सूना   हमारे    दर्द    का    एवान   हो   गया। 

इक  लफ़्ज़  ने  ख़ुदी  के  मआनी बदल  दिए ,
इक  लफ़्ज़  काएनात  का  उन्वान  हो  गया। 

जो  ग़लबा  ए  जुनूँ  में  कहा  दर्ज कर लिया ,
दीवाना  आज  साहिब  ए  दीवान  हो  गया। 
मनीष शुक्ला 





نیکی  بدی  میں  پڑ  کے  پریشان  ہو  گیا 
دل  کاروبار  زیست   میں   حیران  ہو  گیا 

جاتی    بہار   لے   گیی   سبزہ   درخت  کا 
دور    خزاں   میں   ٹوٹنا   آسان   ہو   گیا 

کیسی   عجیب   بستیاں   تعمی ر  ہو  گیئں 
یہ    کیا   ہوا   کہ   شہر   بیابان   ہو   گیا 

امید کا  کھنڈر  تھا جو دل میں وہ ڈھہ گیا 
یہ  دشت  آج  ٹھیک  سے  ویران  ہو  گیا 

اک   زخم کا چراغ تھا روشن وہ  بجھ  گیا 
سونا    ہمارے   درد   کا   ایوان   ہو   گیا 

اک  لفظ  نے  خودی  کے  معنی بدل دے 
اک     لفظ   کائنات   کا   عنوان   ہو  گیا 

جو   غلبہ  جنوں  میں  کہا  درج کر  لیا 
دیوانہ     آج   صاحب   دیوان   ہو   گیا 
منیش شکلا 




हौसला  अब  नातवां  होने  लगा। 
मैं  शरीक  ए  कारवां  होने  लगा। 

बेख़ुदी  हद  से  ज़ियादा  बढ़  गई ,
अपने  होने  का  गुमां  होने  लगा। 

अब  मिरी  बरबादियां नज़दीक हैं ,
अब  मैं  ख़ुद पे मेहरबां होने लगा। 

अब मैं उसकी दस्तरस में आ गया ,
अब  वो  मुझसे बदगुमाँ होने लगा। 

जब मैं ख़ुद से फ़ासला रखने लगा ,
तब  से  मुझ  पे  मैं अयाँ होने लगा। 

बुझते  सूरज  ने  न जाने क्या कहा ,
शाम  का  चेहरा  धुवाँ  होने  लगा। 

चाँद    तारे  आसमां   पर  आ  गए ,
रात  का  क़िस्सा  रवां  होने लगा। 
मनीष शुक्ला 




حوصلہ    اب    ناتواں    ہونے    لگا 
میں   شریک    کارواں     ہونے   لگا 

بے  خودی  حد  سے  زیادہ   بڑھ  گیی 
اپنے   ہونے   کا   گماں   ہونے   لگا 

اب    مری    بربادیاں    نزدیک    ہیں 
اب  میں   خود پہ  مہرباں  ہونے  لگا 

اب    میں  اس کی دسترس  میں  آ گیا 
اب  وہ مجھ  سے  بدگماں  ہونے  لگا 

جب   میں خود سے فاصلہ رکھنے لگا 
تب   سے مجھ پر میں عیاں ہونے لگا 

بجھتے  سورج  نے نہ جانے کیا   کہا 
شام    کا   چہرہ   دھواں    ہونے  لگا 

چاند    تارے   آسماں     پر   آ     گئے 
رات    کا   قصّہ   رواں   ہونے    لگا 
منیش شکلا 

Saturday, 2 July 2016



रास्तों   पर   अज़ाब    बैठे   थे। 
घर   में   ख़ाना  ख़राब  बैठे थे। 

मश्वरे   दे   रहे   थे   अंधियारे ,
सरनिगूं    आफ़ताब    बैठे  थे। 

रात  पर  भी  शबाब   तारी था ,
हम   भी  होने  ख़राब  बैठे  थे। 

कितना रंगीन  था मिरा सहरा ,
कैसे   कैसे    सराब   बैठे    थे। 

उसकी  आँखों से उड़ गईं नींदें ,
उसकी आँखों पे ख़्वाब बैठे थे। 

एक  सफ़हे पे रुक गए  आकर ,
पढ़ने  दिल  की किताब बैठे थे। 

  कितने ग़म यकबयक उभर आये ,
रुख़   पे  डाले   नक़ाब  बैठे   थे। 
मनीष शुक्ला 




راستوں    پر  عذاب   بیٹھے  تھے 
گھر میں خانہ خراب   بیٹھے  تھے 

مشورے دے  رہے تھے اندھیارے 
سر   نگوں   آفتاب   بیٹھے   تھے 

رات   پر   بھی  شباب  طاری   تھا 
ہم  بھی ہونے خراب بیٹھے   تھے 

کتنا     رنگین    تھا   مرا    صحرا 
کیسے کیسے سراب  بیٹھے  تھے 

اسکی  آنکھوں سے اڈ  گیں نیندیں 
اسکی آنکھوں پہ خواب بیٹھے تھے 

ایک    صفحے  پہ  روک گئے  آکر 
پڑھنے   دل  کی کتاب بیٹھے  تھے 

کتنے    غم   یک  بیک  ابھر   اے 
رخ  پہ  ڈالے  نقاب  بیٹھے   تھے 
منیش شکلا 

Friday, 1 July 2016




जाने  किस  शै  के  तलबगार  हुए  जाते  हैं।

 खेल   ही   खेल   में   बीमार   हुए   जाते   हैं। 

क़ाफ़िला दर्द  का  चेहरे  से  गुज़र  जाता  है ,

ज़ब्त   करते   हैं   तो  इज़हार   हुए  जाते  हैं। 



भला  किसको  यक़ीं आएगा मेरी  बात पर  लेकिन ,

कभी   मैंने  मुजस्सम  चांदनी  को  छू के देखा  था। 


किसी   के  इश्क़  में बरबाद  होना।

 हमें  आया   नहीं   फ़रहाद    होना।

कोई   तामीर की  सूरत तो  निकले ,

हमें    मंज़ूर   है    बुनियाद   होना। 


कितनी उजलत में  मिटा डाला गया।

दफ़अतन  सब कुछ भुला डाला गया। 

हम   चराग़ों  की   मदद   करते   रहे ,

और  उधर  सूरज  बुझा  डाला  गया। 


हमें ख़्वाबों की  दुनिया  तो  मयस्सर  हो  नहीं  पाई ,

मगर ख़्वाबों की दुनिया पर फ़साने लिख रहे हैं हम।


मुख़ालिफ़ीन   को  हैरान  करने  वाला हूँ। 

मैं  अपनी  हार का  ऐलान करने वाला हूँ। 

सुना   है दश्त  में  वहशत  सुकून पाती है ,

सो   अपने  आपको वीरान करने वाला हूँ। 


तुम  अपनी  बात   कहना  जानते हो ,

तुम्हें लफ़्ज़ों   की  आसानी  मुबारक।






  आग हवा और पानी ही   सरमाया था ,

 हद से हद हम लोग धुवाँ हो सकते थे।


 वो  आस्मां    हूँ  कि  मातम  नसीब  है जिसका ,

 सितारे   रोज़   ही   करते  हैं  ख़ुदकुशी   मुझमें। 


कभी कभी कुछ ऐसे दिलकश मंज़र दिखते हैं शब भर,

नींद भी खुल जाये तो आँखें ख़्वाब से लिपटी रहती हैं।


सभी से ऊबकर  यूँ तो  चले  आये हो  ख़ल्वत में ,

मगर ख़ुद से भी उकताने में कितनी देर लगती है?



 तुम्हारा  हौसला  रखने  को   हंस   दिए   वरना ,

तुम्हारी  बात  ने  हमको   सिवा  उदास   किया।


सहर से  शाम रहती  है  यही मुश्किल मिरे आगे

कभी रस्ता  मिरे  आगे कभी  मंज़िल मिरे आगे।



                            कभी  दिल  में  मिरे  तेरे  सिवा  हर  बात  होती  है 

                 कभी  दिल  में  मिरे  तेरे  सिवा  कुछ  भी  नहीं होता।


                 चाँद   सितारे  मुट्ठी  में  थे ,  सूरज  से  याराना   था,

          क्या दिन थे जब ख़्वाब नगर में अपना आना जाना था। 

                 तुझे  मुकम्मल  करना  था  इक  हिस्सा  मेरे क़िस्से का ,
  
           मुझको  तेरे  अफ़साने  में    इक  किरदार  निभाना  था ,



जब  तक  हमारे  नाम से वाक़िफ़ हुआ  जहाँ,

    तब  तक  हमारे  नाम  का  पत्थर उखड़ गया।  

                       
हो गया चीख के खामोश परिंदा लेकिन,

मुद्दतों तक रहीं माहौल  पे तारी चीखें।


यही है ज़िन्दगी  भर  का  असासा,

अगर ये ज़ख्म  भी भरने लगा तो.


अब  हमारे  बीच  दरवाज़ा  नहीं  दीवार  है 

                    और कोई दीवार दस्तक से कभी खुलती नहीं .


जो हर लम्हा बदलता जा रहा है,

यही चेहरा मिरी पहचान है क्या?