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Monday, 4 July 2016




नेकी   बदी   में   पड़  के   परेशान   हो  गया। 
दिल   कारोबार  ए  ज़ीस्त  में हैरान हो  गया। 

जाती   बहार   ले   गई   सब्ज़ा  दरख़्त    का ,
दौर    ए ख़िज़ां   में  टूटना  आसान हो  गया। 

कैसी   अजीब     बस्तियां   तामीर   हो   गईं ,
ये    क्या  हुआ  कि शहर बियाबान हो  गया। 

उम्मीद का खंडर  था जो दिल में वो ढह गया ,
ये  दश्त  आज  ठीक   से   वीरान   हो   गया। 

इक ज़ख़्म  का चराग़ था रौशन वो बुझ गया ,
सूना    हमारे    दर्द    का    एवान   हो   गया। 

इक  लफ़्ज़   ने  ख़ुदी  के  मआनी बदल  दिए ,
इक   लफ़्ज़  काएनात  का  उन्वान  हो  गया। 

जो  ग़लबा  ए  जुनूँ  में  कहा   दर्ज कर लिया ,
दीवाना   आज  साहिब   ए  दीवान  हो  गया। 
मनीष शुक्ला 


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