Follow by Email

Monday, 4 July 2016





हौसला  अब  नातवां  होने  लगा। 
मैं  शरीक  ए  कारवां  होने  लगा। 

बेख़ुदी  हद  से  ज़ियादा  बढ़  गई ,
अपने  होने  का  गुमां  होने  लगा। 

अब  मिरी  बरबादियां नज़दीक हैं ,
अब  मैं  ख़ुद पे मेहरबां होने लगा। 

अब मैं उसकी दस्तरस में आ गया ,
अब  वो  मुझसे बदगुमाँ होने लगा। 

जब मैं ख़ुद से फ़ासला रखने लगा ,
तब  से  मुझ  पे  मैं अयाँ होने लगा। 

बुझते  सूरज  ने  न जाने क्या कहा ,
शाम  का  चेहरा  धुवाँ  होने  लगा। 

चाँद    तारे  आसमां   पर  आ  गए ,
रात  का  क़िस्सा  रवां  होने लगा। 
मनीष शुक्ला 

No comments:

Post a Comment