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Wednesday, 28 December 2016



دشت میں خاک اڑانے سے کہاں تک بچتے 
ہم  ترا  ہجر  منانے  سے  کہاں  تک بچتے 

اتنے پر لطف اشارے تھے ترے لفظوں میں 
ہم  تری  بات میں آنے سے کہاں تک بچتے 

جس  سے  ملتے  وہ  تجارت  پہ  اتر آتا تھا 
خود  کو  بازار  بنانے  سے کہاں تک بچتے 

ہم   نے  ہر   جرم  سر  بزم   کیا   تھا  تسلیم 
لوگ پھر سنگ اٹھانے سے کہاں تک بچتے 

ہم  کو  ہر  طور  زمانے  سے  گزر  کرنا تھا 
ہم   بہر حال    زمانے  سے  کہاں تک بچتے 

ہم  ہی  ہر  بار  ہدف  بن  کے چلے آتے تھے 
تم  بھی  پھر تیر چلانے سے کہاں تک بچتے 

ایک     دن  جان  گیا   سارا   زمانہ   جس  کو 
خود  کو  وہ  بات  بتانے سے کہاں تک بچتے 

منیش شکلا 

Friday, 23 December 2016

आँखों को पुरनम, हसरत का दरवाज़ा वा रखा है।
अपने टूटे ख़्वाब को हमने अब तक ज़िंदा रखा है।
इश्क़ किया तो टूट के जी भर,नफ़रत की तो शिद्दत से,
अपने हर किरदार का चेहरा हमने उजला रखा है।
जो आया बाज़ार में वो बस जांच परख कर छोड़ गया,
हमने ख़ुद को सोच समझ कर थोड़ा महँगा रखा है।

था ऐलान कहानी में इक रोज़ नदी भी आएगी,
हमने इस उम्मीद में अब तक ख़ुद को प्यासा रखा है।
अक्सर शीरीं की चाहत ने कोहकनी करवाई है,
अक्सर परबत के सीने पर हमने तेशा रखा है।
हमसे बातें करने वाले उलझन में पड़ जाते हैं,
हमने अपने अंदर ख़ुद को इतना बिखरा रखा है।
तुमने लहजा मीठा रखकर तीखी बातें बोली हैं,
हमने बातें मीठी की हैं लहजा तीखा रखा है।
दुनिया वालों ने तो पूरी कोशिश की ठुकराने की,
लेकिन अपनी ज़िद में हमने ख़ुद को मनवा रखा है।
हमको अब ख़ुद रस्ता चलकर मंज़िल तक पहुंचायेगा,
कांधों पर सूरज है अपने ,सर पर साया रखा है।
मनीष शुक्ला
वा - खुला , कोहकनी - पर्बत तोड़ना ,तेशा - छेनी 

Thursday, 8 December 2016




گر    ادھر   چلے  آتے   تم  کسی  بہانے   سے 
 ہم    نجات   پا  جاتے  دو  گھڈی  زمانے  سے 

جب    کبھی  اکیلے   میں  پاس  آ کے بیٹھی ھے 
لگ  کے خوب روے ہیں  زندگی کے شانے سے 

صرف    اشک  دے  کر  ہی  تم  خرید  سکتے ہو  
ہم     نکل   کے   آے   ہیں  درد کے خزانے سے 

شب   کو  شب  بنانے  کے  اور  بھی شرایط ھیں 
رات    ہو  نهیں   جاتی   چاند   جگمگانے   سے 

درد     تھا  قرینے سے چھپ کے رو لئے ہو تے 
کیا     ملا   بھلا   اس   کو   مدعا    بنانے   سے 

ایک دن ستاروں سے مل کے ان سے پو چھینگے  
ا وب   کیوں   نهیں   جاتے  روز   جھلملانے سے 

یہ   الگ   کہ   أخر   میں   ہم  ہی   جیت  جاینگے 
فائدا     نہیں    لیکن    بات    اب   بڑھانے   سے 

عمر   بھر   کی   رندی  نے  بس  یهی  سکھایا ہے 
پیاس   اور   بڈھتی   ہے   پیاس  کو  بجھانے سے 

دکه  تو  ہے  حسیں  منظر  آنکھ  سے  ہوا  اوجھل 
نیند  کھل   گیئ   لیکن   خواب   ٹوٹ   جانے  سے 

منیش شکلا 




Saturday, 20 August 2016




اسنے   ممکن   ہے   آزمایا   ہو 
وہ   بہانے  سے   لڈ کھڈاایا   ہو 

یہ بھی ممکن ہے بھیڈ میں  اتنی 
وہ  بھی مجھکو  نہ دیکھ پایا ہو 

ہو  بھی  سکتا ہے نیند ٹوٹی  ہو 
ہو  بھی  سکتا ہے خواب آیا  ہو 

کیوں کسی غم کو میں ودائ دوں 
ایک  آنسو  بھی  کیوں  پرایا ہو 

کاش  وہ جنگلوں میں بھٹکا  ہو 
اور  رستہ   نہ  بھول    پایا   ہو 

اب   کوئی  فرق  ہی  نہیں  پڑتا 
دھوپ برسے کہ سر پہ  سایا ہو 

تب چمک دیکھ سبزہ زاروں کی 
دشت  جب  دھوپ میں نہایا  ہو 

منیش شکلا 


Saturday, 16 July 2016




आदरणीय श्री उदयप्रताप सिंह जी के कवि रूप से मेरा परिचय काफ़ी पुराना है। उनको बहुत छुटपन से कवि सम्मेलनों और मुशायरों में सुनते  रहने का सौभाग्य मुझे प्राप्त है। उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलने का मौक़ा लगभग तीन बरस पहले मिला जब एक मुशायरे के सिलसिले में मुझे मुम्बई जाना था। मुशायरे के कन्वीनर का फ़ोन मेरे पास आया कि जनाब उदयप्रताप सिंह साहब भी मुशायरे में शिरकत करने मुम्बई जा रहे हैं और मुझे उनके साथ जाना होगा।मुझे उनका मोबाइल  नंबर इस ताक़ीद के साथ दिया गया कि मैं उनसे बात करके सभी इंतेज़ामात देख लूँ। ख़ैर , मैंने डरते डरते श्री उदयप्रताप जी को फ़ोन लगाया और एक खूबसूरत और नफ़ीस आवाज़ से मेरी मुलाक़ात हुई। बात हुई और साथ जाने की बात तै हो गयी। टिकट्स एक ही फ्लाइट में बुक करना तै हुआ और एयरपोर्ट पर मुलाक़ात की बात के साथ बात ख़त्म हुई। बात करने के बाद मुझे अहसास हुआ कि इतना क़द्दावर शख़्स  किस दरजा मुख़लिस और सादा है ,मुझे बहुत संकोच हो रहा था कि इनके साथ सफ़र पता नहीं कैसा रहेगा ?ये भी ज़ेहन में आ रहा था कि उनको कोई परेशानी पेश आई तो कैसे सम्भाला जाएगा वग़ैरह वग़ैरह। फिर वो दिन आया जब हम लोग एक साथ मुंबई की फ्लाइट में बैठे और लगभग ढाई घंटा साथ रहे। सफ़र के दौरान मुझे बख़ूबी मालूम हो गया कि मैं आज के हिन्दोस्तान के एक शानदार कवि और शायर तथा एक अज़ीम शख़्सियत से रूबरू हूँ। व्यक्तिगत रूप से राजनीतिक जीवन से जुड़े साहित्यकारों के बारे में मेरी राय बहुत मयारी  नहीं रही है ,ख़ासतौर पर उनके साहित्यिक स्तर  और जीवन दृष्टि  को लेकर। लेकिन श्री उदयप्रताप जी को देख के मालूम हुआ कि राजनीतिक जीवन में रहकर भी कैसे कमल की तरह निष्कलंक और सरल रहा जा सकता है।
मेरा सौभाग्य ये रहा की श्री उदयप्रताप जी से उस मुशायरे के बाद कई मुशायरों में मुलाक़ात हुई और हर बार मैं खुद को उनके निकटतर पाता  गया।  उन्होंने भी अपना निश्छल प्रेम मुझ पर न्योछावर किया। ईश्वर  की लीला ये रही कि  इसी दौरान मुझे शासन द्वारा उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ का अतिरिक्त कार्यभार दे दिया गया।  मेरे कार्यभार ग्रहण  करने के कुछ समय पश्चात निदेशक हिंदी संस्थान की सेवानिवृत्ति के बाद निदेशक के पद का  कार्यभार भी शासन ने मुझे ही सौंप दिया जिसकी वजह से श्री उदयप्रताप जी के साथ मैं शासकीय रूप से भी जुड़ गया।
 श्री उदयप्रताप जी के साथ बिताया गया ये वक़्त मेरे लिए बहुत क़ीमती  है। मैं खुद को सौभाग्यशाली समझता  हूँ कि मुझे उनको इतने क़रीब से देखने ,जानने, सुनने और उनसे कुछ सीखने का मौक़ा मिला । इतना पढ़ा लिखा खांटी कवि ,ख़ालिस शायर ,खूबसूरत शख्सियत का मालिक, सरल, निष्कपट, सहृदय ,विद्वान ,तीक्ष्ण बुद्धि , मंजा  हुआ राजनीतिज्ञ , सृजनात्मक व्यक्तित्व का धनी  ,चिंतक,विचारक , इंसान बिरले ही नज़र में आता है। बाइबिल में लिखा है कि मेरे राज्य में वो प्रवेश करेंगे जो बच्चों जैसे हैं। श्री उदयप्रताप जी को देख कर उस बात पर यक़ीन करने को दिल चाहता है। उनको देख के लगता यूँ है जैसे  वो सदैव स्वर्गिक आनंद में रहते हैं। कभी क्रोध ,उद्दिग्नता या नैराश्य का भाव उनमें नज़र नहीं आता। हर वक़्त एक बालसुलभ मुस्कान उनके चेहरे पे खेलती रहती है। उनके पास आकर तुरंत ऐसा अहसास होता है जैसे कड़ी धूप  में अचानक आप किसी  बरगद के नीचे आ जाएं। उनकी बातें सुनिए तो सुनते चले जाइए। स्मरण शक्ति ऐसी कि आप हतप्रभ रह जाइए। अपनी और दूसरे कवियों और शायरों  की सैंकड़ों पंक्तियां इन्हें मुंह ज़बानी याद हैं। विशुद्ध कविता से प्रेम उनका मूल भाव है। सामाजिक सरोकारों पर गहरी नज़र ,उनकी समझ और उनके हल सब उदयप्रताप जी के सामने सदा स्पष्ट रहते हैं। वे हिन्दोस्तान की मिली जुली  संस्कृति के पक्षधर हैं और साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए हमेशा प्रयासरत रहते हैं। साथ ही हिंदी और उर्दू भाषा के बीच की दूरी उनकी चिंता और दुःख का कारण  है। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में उनका सेवाकाल संस्थान के स्वर्णकालों में से एक सिद्ध होगा ये मेरा विश्वास है। पिछले चार वर्षों में उन्होंने संस्था को जो ऊंचाइयां बख़्शी हैं वो क़ाबिल ए तारीफ़ है।    उनको जानकार ,उनसे बातें करके ज़िन्दगी और जीवन मूल्यों पर भरोसा मज़बूत होता है और सच पर टिके रहने की शक्ति प्राप्त होती है। उनकी ज़िन्दगी से जुड़ी छोटी बड़ी अनेक घटनाएं हैं जिनसे उनका जुझारू, सत्यप्रेमी और निर्भीक स्वरुप उभरकर सामने आता है।श्री उदयप्रताप जी सच मायनों में एक आदमक़द शख़्सियत हैं।
उदयप्रताप जी की कविता पर मैंने ज़्यादा कुछ नहीं कहा क्यूंकि उसपर बहुत कुछ कहा जा चुका है और मैं ख़ुद को इस लाएक़ नहीं समझता हूँ कि उनकी कविता पर आलोचनात्मक पंक्तियां लिख सकूं। बस मैं ये कह सकता हूँ कि मुझे उनके गीत और कवितायेँ बहुत पसंद हैं। ख़ास तौर पर छन्द पर उनकी पकड़ तो अद्भुत है। कठिन से कठिन विषय और बिम्ब उनकी कविता में इतनी आसानी से शक्ल लेते जाते हैं कि हैरत होती है।
श्री उदयप्रताप जी के बारे में जितना लिखा कहा जाये वो कम होगा, मैं उनके ऊपर अभी कई सफ़हे लिख सकता हूँ लेकिन शायद फ़िलहाल इसकी गुंजाइश नहीं है। इश्वर ने मौक़ा दिया तो बहुत सी और बातें उनके बारे में की जाएंगी।  फ़िलहाल ईश्वर से प्रार्थना है कि वो उदयप्रताप जी को स्वस्थ रखे और शतायु करे ताकि हिन्दोस्तानी कविता और समाज को उसका सरपरस्त बरसों बरस हासिल रहे।
मनीष शुक्ल 

Tuesday, 5 July 2016




सर  ओ  सामानियों  में  जी  रहे  हो। 
बड़ी     अर्ज़ानियों    में   जी  रहे  हो। 

बड़ी  तकलीफ़ से गुज़रोगे इक दिन ,
बहुत  आसानियों  में   जी   रहे   हो। 

ये  दुनिया  है  यहां  ऐसा   ही   होगा ,
अबस  हैरानियों    में   जी    रहे   हो। 

कोई   तो  नाम  दे  दो  ज़िन्दगी  को ,
क्यूँ   बेउन्वानियों   में   जी   रहे  हो। 

मुहब्बत,  बंदगी , पास  ए  अक़ीदत ,
ये  किन  नादानियों  में  जी  रहे  हो। 

अभी  शादाब  लगता  है  सभी कुछ ,
अभी  तुग़यानियों  में   जी   रहे   हो। 

चलो   सहरा  में चलके ग़ुल मचाओ ,
ये  किन  वीरानियों  में  जी  रहे  हो। 

न   तैरा  जाए   है   तुमसे   न   डूबा ,
ये   कैसे  पानियों  में   जी   रहे   हो। 

असीरी  से जो नावाक़िफ़ हैं अपनी ,
तुम  उन ज़िन्दाँनियों  में जी रहे हो। 
मनीष शुक्ला 




Monday, 4 July 2016




سر  و سامانیوں  میں جی  رہے ہو 
بڑی   ارزانیوں  میں  جی  رہے  ہو 

بڑی  تکلیف سے گزروگے اک  دن 
بہت  آسانیوں  میں  جی   رہے   ہو 

یہ    دنیا  ہے  یہاں  ایسا  ہی   ہوگا 
عبث   حیرانیوں  میں  جی  رہے  ہو 

کوئی   تو  نام   دے   دو  زندگی  کو 
کیوں بے عنوانیوں میں جی رہے ہو 

محبّت      بندگی      پاس     عقیدت 
یہ  کن  نادانیوں  میں  جی  رہے  ہو 

ابھی  شاداب  لگتا ہے  سبھی  کچھ 
ابھی  طغیانیوں  میں  جی  رہے   ہو 

چلو  صحرا  میں  چل کے غل مچاؤ  
یہ  کن  ویرانیوں  میں  جی رہے ہو 

نہ  تیرا  جائے  ہے  تمسے نہ ڈوبا 
یہ  کیسے  پانیوں میں جی رہے  ہو 

اسیری  سے  جو  نا واقف  ہیں اپنی 
تم  ان  زندانیوں  میں جی  رہے ہو 
منیش شکلا 



नेकी   बदी  में   पड़  के   परेशान  हो  गया। 
दिल   कारोबार  ए  ज़ीस्त में हैरान हो  गया। 

जाती   बहार   ले   गई   सब्ज़ा  दरख़्त    का ,
दौर    ए  खिज़ां  में  टूटना  आसान हो  गया। 

कैसी   अजीब     बस्तियां   तामीर   हो   गईं ,
ये    क्या  हुआ कि शहर बियाबान हो  गया। 

उम्मीद का खंडर था जो दिल में वो ढह गया ,
ये  दश्त  आज  ठीक  से   वीरान   हो   गया। 

इक ज़ख़्म का चराग़ था रौशन वो बुझ गया ,
सूना   हमारे    दर्द    का    एवान   हो   गया। 

इक  लफ़्ज़  ने  ख़ुदी  के  मआनी बदल  दिए ,
इक  लफ़्ज़  काएनात  का  उन्वान  हो  गया। 

जो  ग़लबा  ए  जुनूँ  में  कहा  दर्ज कर लिया ,
दीवाना  आज  साहिब  ए  दीवान  हो  गया। 
मनीष शुक्ला 





نیکی  بدی  میں  پڑ  کے  پریشان  ہو  گیا 
دل  کاروبار  زیست   میں   حیران  ہو  گیا 

جاتی    بہار   لے   گیی   سبزہ   درخت  کا 
دور    خزاں   میں   ٹوٹنا   آسان   ہو   گیا 

کیسی   عجیب   بستیاں   تعمی ر  ہو  گیئں 
یہ    کیا   ہوا   کہ   شہر   بیابان   ہو   گیا 

امید کا  کھنڈر  تھا جو دل میں وہ ڈھہ گیا 
یہ  دشت  آج  ٹھیک  سے  ویران  ہو  گیا 

اک   زخم کا چراغ تھا روشن وہ  بجھ  گیا 
سونا    ہمارے   درد   کا   ایوان   ہو   گیا 

اک  لفظ  نے  خودی  کے  معنی بدل دے 
اک     لفظ   کائنات   کا   عنوان   ہو  گیا 

جو   غلبہ  جنوں  میں  کہا  درج کر  لیا 
دیوانہ     آج   صاحب   دیوان   ہو   گیا 
منیش شکلا 




हौसला  अब  नातवां  होने  लगा। 
मैं  शरीक  ए  कारवां  होने  लगा। 

बेख़ुदी  हद  से  ज़ियादा  बढ़  गई ,
अपने  होने  का  गुमां  होने  लगा। 

अब  मिरी  बरबादियां नज़दीक हैं ,
अब  मैं  ख़ुद पे मेहरबां होने लगा। 

अब मैं उसकी दस्तरस में आ गया ,
अब  वो  मुझसे बदगुमाँ होने लगा। 

जब मैं ख़ुद से फ़ासला रखने लगा ,
तब  से  मुझ  पे  मैं अयाँ होने लगा। 

बुझते  सूरज  ने  न जाने क्या कहा ,
शाम  का  चेहरा  धुवाँ  होने  लगा। 

चाँद    तारे  आसमां   पर  आ  गए ,
रात  का  क़िस्सा  रवां  होने लगा। 
मनीष शुक्ला 




حوصلہ    اب    ناتواں    ہونے    لگا 
میں   شریک    کارواں     ہونے   لگا 

بے  خودی  حد  سے  زیادہ   بڑھ  گیی 
اپنے   ہونے   کا   گماں   ہونے   لگا 

اب    مری    بربادیاں    نزدیک    ہیں 
اب  میں   خود پہ  مہرباں  ہونے  لگا 

اب    میں  اس کی دسترس  میں  آ گیا 
اب  وہ مجھ  سے  بدگماں  ہونے  لگا 

جب   میں خود سے فاصلہ رکھنے لگا 
تب   سے مجھ پر میں عیاں ہونے لگا 

بجھتے  سورج  نے نہ جانے کیا   کہا 
شام    کا   چہرہ   دھواں    ہونے  لگا 

چاند    تارے   آسماں     پر   آ     گئے 
رات    کا   قصّہ   رواں   ہونے    لگا 
منیش شکلا 

Saturday, 2 July 2016



रास्तों   पर   अज़ाब    बैठे   थे। 
घर   में   ख़ाना  ख़राब  बैठे थे। 

मश्वरे   दे   रहे   थे   अंधियारे ,
सरनिगूं    आफ़ताब    बैठे  थे। 

रात  पर  भी  शबाब   तारी था ,
हम   भी  होने  ख़राब  बैठे  थे। 

कितना रंगीन  था मिरा सहरा ,
कैसे   कैसे    सराब   बैठे    थे। 

उसकी  आँखों से उड़ गईं नींदें ,
उसकी आँखों पे ख़्वाब बैठे थे। 

एक  सफ़हे पे रुक गए  आकर ,
पढ़ने  दिल  की किताब बैठे थे। 

कितने ग़म यकबयक उभर आये ,
रुख़   पे  डाले   नक़ाब  बैठे   थे। 
मनीष शुक्ला 




راستوں    پر  عذاب   بیٹھے  تھے 
گھر میں خانہ خراب   بیٹھے  تھے 

مشورے دے  رہے تھے اندھیارے 
سر   نگوں   آفتاب   بیٹھے   تھے 

رات   پر   بھی  شباب  طاری   تھا 
ہم  بھی ہونے خراب بیٹھے   تھے 

کتنا     رنگین    تھا   مرا    صحرا 
کیسے کیسے سراب  بیٹھے  تھے 

اسکی  آنکھوں سے اڈ  گیں نیندیں 
اسکی آنکھوں پہ خواب بیٹھے تھے 

ایک    صفحے  پہ  روک گئے  آکر 
پڑھنے   دل  کی کتاب بیٹھے  تھے 

کتنے    غم   یک  بیک  ابھر   اے 
رخ  پہ  ڈالے  نقاب  بیٹھے   تھے 
منیش شکلا 

Friday, 1 July 2016




जाने  किस  शै  के  तलबगार  हुए  जाते  हैं।

 खेल   ही   खेल   में   बीमार   हुए   जाते   हैं। 

क़ाफ़िला दर्द  का  चेहरे  से  गुज़र  जाता  है ,

ज़ब्त   करते   हैं   तो  इज़हार   हुए  जाते  हैं। 



भला  किसको  यक़ीं आएगा मेरी  बात पर  लेकिन ,

कभी   मैंने  मुजस्सम  चांदनी  को  छू के देखा  था। 


किसी   के  इश्क़  में बरबाद  होना।

 हमें  आया   नहीं   फ़रहाद    होना।

कोई   तामीर की  सूरत तो  निकले ,

हमें    मंज़ूर   है    बुनियाद   होना। 


कितनी उजलत में  मिटा डाला गया।

दफ़अतन  सब कुछ भुला डाला गया। 

हम   चराग़ों  की   मदद   करते   रहे ,

और  उधर  सूरज  बुझा  डाला  गया। 


हमें ख़्वाबों की  दुनिया  तो  मयस्सर  हो  नहीं  पाई ,

मगर ख़्वाबों की दुनिया पर फ़साने लिख रहे हैं हम।


मुख़ालिफ़ीन   को  हैरान  करने  वाला हूँ। 

मैं  अपनी  हार का  ऐलान करने वाला हूँ। 

सुना   है दश्त  में  वहशत  सुकून पाती है ,

सो   अपने  आपको वीरान करने वाला हूँ। 


तुम  अपनी  बात   कहना  जानते हो ,

तुम्हें लफ़्ज़ों   की  आसानी  मुबारक।






  आग हवा और पानी ही   सरमाया था ,

 हद से हद हम लोग धुवाँ हो सकते थे।


 वो  आस्मां    हूँ  कि  मातम  नसीब  है जिसका ,

 सितारे   रोज़   ही   करते  हैं  ख़ुदकुशी   मुझमें। 


कभी कभी कुछ ऐसे दिलकश मंज़र दिखते हैं शब भर,

नींद भी खुल जाये तो आँखें ख़्वाब से लिपटी रहती हैं।


सभी से ऊबकर  यूँ तो  चले  आये हो  ख़ल्वत में ,

मगर ख़ुद से भी उकताने में कितनी देर लगती है?



 तुम्हारा  हौसला  रखने  को   हंस   दिए   वरना ,

तुम्हारी  बात  ने  हमको   सिवा  उदास   किया।


सहर से  शाम रहती  है  यही मुश्किल मिरे आगे

कभी रस्ता  मिरे  आगे कभी  मंज़िल मिरे आगे।



                            कभी  दिल  में  मिरे  तेरे  सिवा  हर  बात  होती  है 

                 कभी  दिल  में  मिरे  तेरे  सिवा  कुछ  भी  नहीं होता।


                 चाँद   सितारे  मुट्ठी  में  थे ,  सूरज  से  याराना   था,

          क्या दिन थे जब ख़्वाब नगर में अपना आना जाना था। 

                 तुझे  मुकम्मल  करना  था  इक  हिस्सा  मेरे क़िस्से का ,
  
           मुझको  तेरे  अफ़साने  में    इक  किरदार  निभाना  था ,



जब  तक  हमारे  नाम से वाक़िफ़ हुआ  जहाँ,

    तब  तक  हमारे  नाम  का  पत्थर उखड़ गया।  

                       
हो गया चीख के खामोश परिंदा लेकिन,

मुद्दतों तक रहीं माहौल  पे तारी चीखें।


यही है ज़िन्दगी  भर  का  असासा,

अगर ये ज़ख्म  भी भरने लगा तो.


अब  हमारे  बीच  दरवाज़ा  नहीं  दीवार  है 

                    और कोई दीवार दस्तक से कभी खुलती नहीं .


जो हर लम्हा बदलता जा रहा है,

यही चेहरा मिरी पहचान है क्या?







Thursday, 30 June 2016



किस   क़दर  लाईलाज  थे हम भी। 
सर  ता पा  एहतिजाज  थे हम भी। 

सिर्फ़   बातों    से   टूट   जाते    थे ,
कितने  शीशा  मिज़ाज थे हम भी। 

सुब्ह    दम   हो  गए  धुवाँ   चेहरा ,
रात   रौशन   सिराज  थे  हम  भी। 

हमको दार  ओ रसन पे रुकना था ,
माइल ए तख़्त ओ ताज थे हम भी। 

ख़ास   मौक़ों   पे   याद   आते   थे ,
भूला  बिसरा  रिवाज  थे  हम  भी। 

नामा  ए  ज़िन्दगी  के  सफ़हे  पर ,
इक  जगह   इंदराज  थे  हम   भी। 

तूने  कुछ   ग़ौर  तो  किया   होता ,
तेरी  महफ़िल  में आज थे हम भी। 
मनीष शुक्ला 




کس   قدر  لا علاج  تھے  ہم   بھی 
سر تا پا   احتجاج   تھے  ہم   بھی 

صرف باتوں سے ٹوٹ جاتے تھے 
کتنے  شیشہ  مزاج  تھے  ہم  بھی 

صبح  دم   ہو  گئے  دھواں  چہرہ 
رات  روشن  سراج  تھے  ہم  بھی 

ہم   کو  دار  و رسن  پہ  رکنا  تھا 
مائل   تخت  و  تاج  تھے  ہم  بھی 

خاص   موقعؤں  پہ  یاد آتے  تھے 
بھولا   بسرا  رواج  تھے  ہم  بھی 

نامہ    زندگی    کے   صفحے   پر 
اک   جگہ   اندراج  تھے  ہم  بھی 

تو    نے  کچھ   غور  تو  کیا  ہوتا 
تیری   محفل میں آج تھے ہم  بھی 
منیش شکلا 
कुछ   उदासी  शाम   की  हल्की  करो। 
आ  भी  जाओ  यार  अब  जल्दी करो। 

पड़  गया  फिर  से  उजालों का  क़हत ,
आ  के   थोड़ी    रौशनी    जारी   करो। 

सारी    बातें    लामुनासिब    हैं    यहाँ ,
ख़ुद को किस किस बात पे राज़ी करो। 

रात  के  पहलू  में   रहना  है  तो  फिर ,
रात    की     फ़रमाइशें      पूरी   करो। 

चाँद   से    परदा    हटाओ    अब्र   का ,
बेसबब   ये   रात   मत   काली   करो। 

तुमको  जल्दी  है   पहुँचने  की   मगर ,
मोड़  पर   रफ़्तार    तो    धीमी   करो। 

बाम  ओ  दर  कितने  पुराने  हो   गए ,
वक़्त  है  अब  तुम  ये घर ख़ाली करो। 

बस  मुहब्बत  का   भरम    रखे   रहो ,
झूट   बोलो   या   कि   अय्यारी  करो। 

कोई  तो   रस्ता    निकालेगी    सहर ,
तुम   अभी  से  जी  न  यूँ  भारी  करो। 
मनीष शुक्ला 

Wednesday, 29 June 2016





کچھ  اداسی  شام  کی  ہلکی   کرو 
آ   بھی   جاؤ  یار  اب  جلدی  کرو 

پڑ  گیا  پھر  سے  اجالوں کا  قحط 
آ کے  تھوڑی  روشنی  جاری  کرو 

ساری  باتیں  لا مناسب  ہیں   یہاں 
خود کو کس کس بات پہ راضی کرو 

رات کے پہلو میں رہنا ہے تو پھر 
رات  کی   فرمائشیں  پوری   کرو 

چاند   سے   پردہ   ہٹاؤ   ابر   کا 
بے  سبب  یہ  رات  مت  کالی کرو 

تمکو جلدی ہے پہنچنے کی  مگر 
موڈ   پر  رفتار   تو   دھیمی  کرو 

بام  و  در  کتنے  پرانے  ہو  گئے 
وقت  ہے  اب  تم یہ گھر خالی کرو 

بس  محبّت  کا  بھرم  رکھے رہو 
جھوٹ  بول و یا  کہ  عیاری  کرو 

کوئی  تو   رستہ   نکالیگی   سحر 
تم ابھی سے جی نہ یوں بھاری کرو 
منیش شکلا 

Tuesday, 28 June 2016





دن   کا  لاوا  پیتے    پیتے   آخر   جلنے   لگتا    ہے 
ہوتے   ہوتے   شام   سمندر  روز   ابلنے   لگتا   ہے 

ضبط دھواں ہونے لگتا ہے  انگاروں  کی  بارش  میں 
پھول  سا  لہجہ   بھی  اکتا کر  آگ  اگلنے   لگتا   ہے 

تعبیروں کے  چہرے دیکھ کے وحشت ہونے لگتی ہے 
نیند  میں  کوئی  درکر  اپنے  خواب  کچلنے  لگتا  ہے 

مشکل  یہ  ہے  وقت  کی  قیمت  تب  پہچانی جاتی ہے 
جب  ہاتھوں  سے  لمحہ  لمحہ  وقت پھسلنے لگتا ہے 

یہ  بھی  ہوتا  ہے  غم  کے  مفہوم  بدلتے  جاتے ہیں 
یوں  بھی  ہوتا  ہے  اشکوں  کا رنگ  بدلنے لگتا ہے 

نم  جھونکے نمکین ہوا کے جسم میں گھولتے جاتے ہیں 
پتھر  کیسا   بھی    ہو    آخرکار    پگھلنے    لگتا   ہے 

بوند   کو  دریا   میں   کھو   دینا   اتنا  بھی  آسان  نہیں 
مدہوشی  تک  آتے  آتے   ہوش   سمبھلنے   لگتا   ہے 
منیش شکلاں 

Saturday, 25 June 2016

               غزل

   جانے کس شے کے  طلبگار ہوئے جاتے ہیں

کھیل ہی کھیل میں بیمار ہوئے جاتے ہیں


قافلہ درد کا چہرے سے گزر جاتا ہے

ضبط   کرتے ہیں تو اظہار ہوئے جاتے ہیں


کون سے خواب سجا بیٹھے ہیں ان آنکھوں میں

کن امیدوں کے گرفتار ہوئے جاتے ہیں


دن گزرتا ہے عبث رات گزر جاتی ہے

رفتہ رفتہ یوں ہی بے کار ہوئے جاتے ہیں


راستے جو کبھی ہموار نظر آتے تھے

دیکھتے دیکھتے دشوار ہوئے جاتے ہیں


توبہ کرنا جو ضروری ہے عبادت کے لئے

تو خطا کرکے گنہگار ہوئے جاتے ہیں


جتنا کھلتے ہیں ادھر اتنی گرہ پڑتی ہے

ہم کہ ہر روز طرحدار ہوئے جاتے ہیں


کوئی گھٹتا ہی چلا جائے ہے پیہم ہم میں

اپنے اوپر ہی گرانبار ہوئے جاتے ہیں

منش  شکلا  
                                            



              दिन  का लावा पीते पीते आख़िर जलने  लगता  है।  
   होते   होते  शाम   समंदर  रोज़  उबलने  लगता  है। 

 ज़ब्त  धुवां होने  लगता है  अंगारों की  बारिश   में ,
     फूल सा लहजा भी उकताकर आग उगलने लगता है। 

   ताबीरों   के  चेहरे देख  के वहशत  होने  लगती   है ,
       नींद में कोई  डरकर  अपने ख़्वाब  कुचलने लगता है। 

इक चेहरा आड़े आ जाता है मरने की ख्वाहिश के ,
  उसको देख के जीने का अरमान मचलने लगता है। 

     मुश्किल ये है वक़्त की क़ीमत तब पहचानी जाती है ,
   जब हाथों से लम्हा लम्हा वक़्त फिसलने लगता है। 

   ये   भी  होता  है  ग़म के  मफ़हूम  बदलते  जाते  हैं ,
    यूँ  भी  होता  है  अश्कों  का  रंग  बदलने लगता  है।  

   नम  झोंके नमकीन हवा के जिस्म में घुलते जाते हैं ,
  पत्थर  कैसा भी  हो  आख़िरकार पिघलने लगता है। 

  बूँद  को  दरिया  में  खो  देना इतना भी आसान नहीं ,
   मदहोशी  तक  आते  आते  होश  संभलने  लगता है। 


मनीष शुक्ला