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Thursday, 30 June 2016



किस  क़दर  लाईलाज  थे हम भी। 
जिस्मओ जां एहतिजाज थे हम भी। 

सिर्फ़   बातों     से    टूट   जाते    थे ,
कितने  शीशा   मिज़ाज थे  हम भी। 

सुब्ह    दम   हो   गए  धुवाँ   चेहरा ,
रात   रौशन   सिराज   थे  हम  भी। 

हमको दार  ओ रसन पे रुकना था ,
माइल ए तख़्त ओ ताज थे हम भी। 

ख़ास   मौक़ों    पे   याद   आते   थे ,
भूला  बिसरा   रिवाज  थे  हम  भी। 

नामा  ए  ज़िन्दगी    के  सफ़हे  पर ,
इक  जगह   इंदराज   थे  हम   भी। 

तूने   कुछ   ग़ौर  तो  किया   होता ,
तेरी  महफ़िल  में आज  थे हम भी। 
मनीष शुक्ला 


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