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Wednesday, 22 June 2016





इन्हीं  हाथों  से अपनी ज़िन्दगी को छू के  देखा था। 
वो सपना था या फिर मैंने किसी को छू के देखा था ?

कई   रंगों  के  मंज़र  आज  भी  रक़्सां   हैं आँखों में ,
मिरी   आँखों  ने  ऐसी  सादगी  को  छू  के देखा था। 

अजब  सी   आग  में  जलने  लगा सारा बदन मेरा ,
मिरे  होंठों  ने  उसकी  तिश्नगी  को छू के देखा था। 

किसी के लम्स का जादू मिरी रग रग में उतरा  था ,
मिरे  एहसास  ने  दीवानगी   को  छू  के  देखा  था। 

फ़क़त  इक  बार  मैंने  चाँद  की  ज़ुल्फ़ें संवारी  थीं ,
फ़क़त  इक  बार  मैंने  रौशनी  को  छू  के देखा था। 

भला  किसको  यक़ीं आएगा मेरी  बात पर  लेकिन ,
कभी   मैंने  मुजस्सम  चांदनी  को  छू के देखा  था। 

पिघलकर  बह   गए  बेबाक  लहरों  के  इशारों   पर ,
किनारों  ने  अबस  चढ़ती  नदी  को  छू के देखा था। 
मनीष शुक्ला 

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