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Friday, 10 June 2016





बरहमी   के    शोर   में   सरगोशियां    बेकार   हैं। 
अब    हमारे   बीच   की   नज़दीकियां   बेकार  हैं। 

अब   तिरी  ख़ामोशियाँ  पढ़ने  की क़ूवत खो गयी ,
अब   लब  ए  ख़ामोश  की  सब अर्ज़ियाँ बेकार हैं। 

जाने कितने ख़्वाब आकर मिल गए इक ख़्वाब में ,
अब     हमारी   रात   की    तन्हाईयाँ    बेकार    हैं। 

अब   कोई    दरिया   हमारे   दरमियाँ  बहता  नहीं ,
अब    हमारे   साहिलों    की   कश्तियाँ   बेकार हैं। 

अब  चमन  के  फूल  खिलने  पर ही आमादा नहीं ,
अब    बहारों  की   ये   सारी   शोख़ियां   बेकार  हैं।

अब  चराग़ांं  ही   नहीं  इनकी  वज़ाहत  के   लिए ,
अब  दयार   ए   शाम  की  तारीकियाँ  बेकार   हैं। 

अब  कोई  अहल  ए  जुनूँ  को  ढूँढ़ने  आता  नहीं ,
अब   गरेबां   की  बिखरती  धज्जियाँ   बेकार   हैं। 
मनीष शुक्ला 

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