Follow by Email

Tuesday, 21 June 2016





जाने  किस  शै  के  तलबगार  हुए  जाते  हैं। 
खेल   ही   खेल   में   बीमार   हुए   जाते   हैं। 

क़ाफ़िला दर्द  का  चेहरे  से  गुज़र  जाता  है ,
ज़ब्त   करते   हैं   तो  इज़हार   हुए  जाते  हैं। 

कौन से ख़्वाब  सजा  बैठे  हैं  हम  आँखों  में ,
किन  उम्मीदों  के  गिरफ़्तार  हुए   जाते   हैं। 

दिन  गुज़रता  है  अबस  रात  गुज़र जाती है ,
रफ़्ता   रफ़्ता   यूँ  ही   बेकार  हुए   जाते   हैं। 

रास्ते    जो    कभी   हमवार   नज़र   आते  थे,
देखते     देखते    दुशवार    हुए    जाते      हैं। 

तौबा  करना  जो  ज़रूरी  है इबादत के लिए ,
तो   ख़ता   करके   गुनहगार   हुए   जाते  हैं। 

जितना खुलते हैं उधर उतनी गिरह पड़ती है ,
हम   कि  हर  रोज़  तरहदार  हुए   जाते   हैं। 

कोई  घुटता चला जाता है  मुसलसल हम में ,
अपने   ऊपर   ही   गिरांबार   हुए   जाते  हैं। 

मनीष शुक्ला 

No comments:

Post a Comment