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Tuesday, 7 June 2016




दिल  में जाने  क्या  क्या आने लगता है। 
बैठे    बैठे    जी    घबराने    लगता    है। 

आने    वाले    कल   से  दहशत होती है ,
माज़ी   का  हर  अक्स  डराने लगता है। 

अंदर   से    आवाज़ें   आने    लगती    हैं ,
कोई  सब  कुछ याद  दिलाने लगता  है। 

अपनी   सारी  परतें   खुलने   लगती   हैं ,
भूला   बिसरा  सब  याद आने लगता है। 

सूने   गलियारों   से  डरकर ज़हन  मिरा ,
अपने   तहख़ानों     में   जाने   लगता  है। 

इक   जंगल  सा  घिर आता है शाम  ढले ,
एक    परिंदा    शोर   मचाने   लगता  है। 

इक    झोंका  आता  है  ठंडी  आहों  का ,
सीने    में    तूफ़ान    उठाने   लगता   है। 

आँखों   में   कालिख  सी भरने  लगती है ,
जब   शब  का  साया  गहराने लगता  है। 

कोई   पहले  फूट   के  रोता  है  जी   भर ,
फिर ख़ुद ही ख़ुद को समझाने  लगता है। 
मनीष शुक्ला 



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