Follow by Email

Friday, 10 June 2016





कुछ  एहतमाम  ए जाम ओ सुबू ही नहीं हुआ। 
महफ़िल में इज़न ए  तर्क ए वज़ू ही नहीं हुआ। 

सोलह  सिंगार  शब  के  यक़ीनन  कमाल   थे ,
लेकिन   वो   चाँद  आज  नमू  ही  नहीं   हुआ। 

बाक़ी  तमाम  रंग  भी   आँखों   में   भर   गए ,
अश्कों  का  रंग  सिर्फ़  लहू   ही   नहीं   हुआ। 

जब  तार  चुक  गया   तो   रगें    खींचने   लगे ,
पर   ज़िन्दगी   का   चाक   रफ़ू  ही नहीं हुआ। 

इक  बार  दोस्ती  में   वो   सदमे   उठा   लिए ,
फिर  उसके  बाद  कोई  अदू  ही  नहीं   हुआ।

वैसे    तो   सारे    रूप   दिखाये    हयात   ने ,
लेकिन  मिरे   जहान  में   तू   ही   नहीं   हुआ। 

क़िस्मत  का खेल  हाथ  में आया था आबजू ,
लेकिन  मैं  आज  खुश्कगुलू  ही  नहीं  हुआ। 
मनीष शुक्ला 


No comments:

Post a Comment