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Monday, 12 September 2011

gaye mausam ka dar bandhe hue hai




गए   मौसम   का   डर  बांधे   हुए   है
परिंदा   अब    भी   पर   बांधे  हुए   है



बुलाती   हैं    चमकती     शाह    राहें
मगर    कच्ची    डगर  बांधे   हुए    है



मुहब्बत की कशिश भी क्या कशिश है
समंदर   को    क़मर   बांधे    हुए    है



बिखर  जाता  कभी  का  मैं  खला   में
दुआओं  का    असर   बांधे   हुए    है



चला    जाऊं    जुनूं   के   जंगलों   में
ये   रिश्तों    का   नगर  बांधे  हुए  है


हक़ीक़त   का   पता    कैसे    चलेगा
नज़ारा   ही   नज़र    बांधे   हुए    है


गए   लम्हों  की  इक   ज़ंजीर   या  रब
मिरे   शाम  ओ   सहर  बांधे   हुए  है

मनीष शुक्ल

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