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Tuesday, 6 September 2011

naye manzar sarabon ke

नए   मंज़र  सराबों  के  मिरी आँखों  में भर  देना
अगर मंजिल  नज़र आये  मुझे  गुमराह कर देना,

मुझे ये कशमकश ये शोर ओ ग़ुल  सैराब करते हैं
मिरी कश्ती को दरिया और दरिया को भंवर देना,

मिरी   आवारगी  ही   मेरे  होने   की  अलामत  है
मुझे  फिर इस सफ़र के बाद भी कोई सफ़र देना,

मिरी परवाज़  की  हसरत  यक़ीनन  ज़ोर  मारेगी
अगर उड़ने लगूं तो  मेरे बाल ओ  पर क़तर  देना,

सुना  है   दश्त  में  आगे  बहुत   तारीक  है  रस्ता
मिरे   रख़्त ए सफ़र  में चाँद  या ख़ुर्शीद धर  देना,

बुझा  देना   ज़रा पहले   दिया मेरी  समाअत  का
कभी  मेरी  रिहाई की  मुझे  जब  तुम ख़बर देना,

जुदा करना मिरे इस ख़्वाब से तुम दफ़अतन मुझको
जुदाई  की   मुझे  घड़ियाँ  ख़ुदाया  मुख़्तसर   देना,
मनीष शुक्ल

2 comments:

  1. िमर परवाज़ क हसरत यक़नन ज़ोर मारेगी अगर उड़ने लगूं तो मेरे बाल ओ पर क़तर देना,
    itnee bhi kya majboori hai ki aap hasraton ke bhi par katarna chahte hai?
    Are dost kam se kam hasraron ko to udaan bhar hi lene do!.!.!
    Sundar gajal ke liye badhai.

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