Follow by Email

Tuesday, 30 October 2012

अगर सच  हो गयी मेरी  दुआ  तो
अचानक वो कहीं मिल ही गया तो

पलटने  की  मनाही  है  सफ़र  में
मगर   देने  लगा  कोई   सदा  तो

वो ख़ुद  भी  देर तक  रोता   रहेगा
अगर  उसने  मुझे  रोने  दिया  तो

यही है ज़िन्दगी  भर  का  असासा
अगर ये ज़ख्म  भी भरने लगा तो

तसव्वुर से लरज़ जाता हूँ  जिसके
अगर उसको किसी दिन देखता तो

मुझे  मालूम  हैं आदाब  ए उल्फ़त
मगर  हो  ही  गयी  कोई  ख़ता  तो

मदावा तो नहीं मुमकिन  था  कोई
मगर  वो   हाल  मेरा   पूछता   तो

बहुत कुछ कह रही थीं उसकी आँखें
ज़ुबाँ  से  भी  मगर  कुछ बोलता तो

वो जिनके ज़िक्र से नम  हो गया हूँ
अगर  उन  बारिशों  में  भीगता  तो

बता   देना  हवाओं   का    ठिकाना
 अगर   पूछे  कोई   मेरा   पता  तो
मनीष शुक्ल






No comments:

Post a Comment