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Friday, 14 June 2013

थक कर हुआ है  चूर मुसाफ़िर  का बदन भी .
और उसपे  अँधेरा  भी,  इरादों की थकन भी .

आँखों से  छलकता है,  मिरे ग़म का समंदर ,
सब  हाल  बताती  है मिरी तर्ज़ ए सुखन भी .

उस सिम्त किये जाये कोई  पर्दा  मुसलसल ,
इस सिम्त अधूरी है अभी दिल की लगन भी .

जाती  ही  नहीं  दिल से  वो  इक पीर पुरानी ,
मैं  देख  चुका   करके  कई  बार  जतन  भी .

शब  भर  में  कहीं   डूब  गए  सारे   सितारे ,
आई  न  मगर  चाँद  के  माथे पे  शिकन भी .

ले  लेगा  किसी दिन  मुझे आग़ोश में सूरज,
मिट जायेगी इक रोज़ ये सीने की जलन भी .

कुछ  देर  मिरे  पास  रहो   मुझको  तराशो ,
पत्थर हूँ मगर चाहो तो बन  जाऊं रतन भी .
मनीष शुक्ल



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