Follow by Email

Tuesday, 18 June 2013

चाँद    सितारे   मुट्ठी   में   थे ,   सूरज   से  याराना   था .
क्या दिन थे जब ख़्वाब नगर में अपना आना जाना था .

इक   जादू   सा  जैसे  मेरी  हर  धड़कन  में   उतरा  था ,
मुझको  ख़ुद   मालूम  नहीं  मैं  क्यूँ  इतना  दीवाना था .

सब  मुझको  सौदाई  कह  कर  तुझको रुसवा करते थे ,
नज़रें  मेरी  ओर  थीं  लेकिन  तेरी  ओर   निशाना  था .

जाने  कैसा  शख्स   था , बातें  दीवानों  सी  करता  था ,
ख़्वाबीदा  आँखें  थीं , लब  पर परियों  का अफ़साना था .

एक  कहानी  जिसमें  शायद  सब  कुछ  तै  था पहले से
एक फ़साना जिसमे सब कुछ मिलकर भी खो जाना था .

तुझे  मुकम्मल  करना  था  इक  हिस्सा  मेरे क़िस्से का ,
मुझको  तेरे  अफ़साने  में    इक  किरदार  निभाना  था ,

भीड़   से  बाहर  आकर   देखा  था  दुनिया  के  मेले  को ,
सारी   चहल   पहल  के   पीछे     जां लेवा    वीराना   था .

कब तक मैं समझाता अपने दिल की इक इक धड़कन को,
तेरी   बस्ती  में  तो  हर    इक  हसरत   पर   जुर्माना  था .

आख़िर थक  कर  छोड़  दिया हस्ती की उलझी गुत्थी को ,
सुलझाने की  कोशिश   करना   और  उसे   उलझाना  था .
मनीष शुक्ल






No comments:

Post a Comment