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Tuesday, 19 November 2013

किसी की याद से तन्हाईयाँ चमक उट्ठीं
खिला जो चाँद तो परछाईयाँ चमक उट्ठीं

छुपाना राज़ ए मुहब्बत न हो सका मुमकिन
किसी को देख के बीनाईयाँ चमक उट्ठीं

ये कौन आया अंधेरों में रौशनी बनकर
सियाह बज़्म की रानाईयाँ चमक उट्ठीं

सुना है गुज़रा है बीमार कोई ऐसा भी
कि जिसको छू के मसीहाईयाँ चमक उट्ठीं

कोई  चराग़ सी नज़रों से छू गया मुझको
मिरी थकन की  तवानाईयाँ चमक उट्ठीं

कभी जो देखा धुवाँ उठता आबशारों से
तो दिल में यार की  अंगड़ाईयाँ चमक उट्ठीं

ग़ज़ल में आज ख़यालों के कुछ शरर बिखरे
मिरी तमाम शनासाईयाँ चमक उट्ठीं

मनीष शुक्ल 

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