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Monday, 1 April 2013

कुछ  बुजुर्गों  से  सुनी  है  दास्तान   ए   लखनऊ .
बा अदब नाज़ ओ अदा वो महविशान ए लखनऊ .

मुनफ़रिद लहजा बयां का, इक अजब सा बांकपन,
भीड़   में  तन्हा   दिखें   हैं  साहिबान  ए  लखनऊ .

सब की मंजिल  है  मुहब्बत  सबका वादा है वफ़ा ,
अपनी  धुन  में  जा  रहे  हैं  रहरवान  ए  लखनऊ .

गूंजती  रहती  है  हर  सू   इक  सदा  ए   आफरीं ,
गोशे  गोशे  में  बसे   हैं   आशिक़ान  ए   लखनऊ .

वहशतों के शोर ओ ग़ुल में किस क़दर बेख़ौफ़  हैं ,
अमन का परचम उठाये  मुख्लिसान  ए  लखनऊ .

सद सलामत, सद सलामत ,सद सलामत, सालहा,
ये   दुआएं   मांगते    हैं    दिलबरान   ए   लखनऊ .

ज़िन्दगी  के   आशिक़ों   की   ये   इबादतगाह   है,
मिट न पायेगा कभी नाम ओ निशान  ए  लखनऊ .
  
मनीष शुक्ल 

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