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Thursday, 22 November 2012

पा ब ज़ंजीर थीं हालात की मारी चीखें
आह बनकर ही निकल पाईं हमारी चीखें

 चीखते चीखते  कुहराम मचा रखा है
फिर भी सुनता है यहाँ कौन तुम्हारी चीखें

सर्द आहों में थी वैसे ही बला की शिद्दत
उसपे सन्नाटे ने हैं और उभारी  चीखें

सुनने वाला ही नहीं था कोई तनहाई थी
सिसकियाँ बन गईं आखिर में हमारी चीखें

पहले देखा न सुना दर्द का मातम ऐसा
वो समाअत पे सरकती हुई आरी चीखें

शोर करने की मनाही थी तिरी बस्ती में
तो सियाही से हैं काग़ज़ पे उतारी चीखें

गूंजती ही रहीं जंगल की फज़ाएँ  पैहम
जब तलक पड़ न गईं सांस पे भारी चीखें

हो गया चीख के खामोश परिंदा लेकिन
मुद्दतों तक रहीं माहौल  पे तारी चीखें

फिर ज़मीं पर कोई हंगाम हुआ चाहे है
हो रही हैं सुना अफ़लाक से जारी चीखें

एक दिन फूट के निकलेगा सदा का दरिया
हमने सीने में छुपा रखी हैं सारी चीखें
मनीष शुक्ल 

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