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Friday, 17 February 2017



वज्द  में  जब दस्त ओ  बाज़ू आ  गए। 
तब   जुनूँ   के   होश  क़ाबू   आ  गए। 
शब्   गुज़ारी  का   वसीला  हो   गया ,
ज़ेह्न   में  यादों   के  जुगनू   आ   गए। 

तिशनगी ने  इस  क़दर मातम किया ,
ज़ब्त  की   आँखों   में  आंसू  आ गए। 

उस  गली   के  मौसमों  को याद कर ,
दर्द    की   शाख़ों   पे   टेसू   आ  गए। 

जिन  से क़ाबू  में किया जाता है दिल ,
तुम को शायद  सब  वो जादू आ गए। 

 भर    गईं   रंगीं    हुबाबों     से    ज़मीं ,
 पाओं  में  बारिश  के  घुंघरू आ  गए। 

फिर कोई काला  घना  बादल   दिखा ,
फिर   ख़यालों   में  वो   गेसू  आ  गए। 
मनीष शुक्ला 

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