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Wednesday, 18 May 2016




मुंतशिर करके कभी ख़ुद को मुरत्तब करके। 
हमने  देखा  है  कई  बार  यही  सब   करके। 

शाम   होते   ही   बयाबां  में  बदल  जाते    हैं ,
दिन  के हंगाम का हर नक़्श मुख़र्रब  करके। 

अपने    ख़्वाबों  को  चमनज़ार  बना   लेते  हैं ,
अपनी   रातों को तिरे ग़म से मुतय्यब  करके। 

अपनी  तनहाई  में  हर  रोज़  छलक  लेते   हैं ,
अपने   एहसास के कासे को लबालब करके। 

अपनी   यकरंग   तबीयत  को  रवां  करते   हैं ,
सरकशी करके कभी ख़ुद को मुहज़्ज़ब करके। 

रोज़   हम  ख़ुद   से  सवालात किया  करते हैं ,
जाने किस किस को ख़यालों में मुख़ातब करके। 

हम   सुनाते  ही  चले  जाते  सहर  तक  लेकिन ,
तुमने  क़िस्सा किया दुशवार  कहाँ कब करके। 

कोई   पहुंचे   न   जहाँ   देखने   वाला   हरगिज़ ,
हमने   रखा   है   वहां   ख़ुद  को मुरज्जब करके। 

इक   सियाही   सी   निगाहों   में   उतर  आएगी ,
दिन   को   देखोगे   अगर रोज़  यूँ ही शब करके। 

मनीष शुक्ला 


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