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Saturday, 28 May 2016

इतनी  जल्दी  न मान जाया कर। 
तू   ज़रा   बात  को  बढ़ाया   कर। 

अब्र   है  तो   ज़रा  बरस  मुझ  पर ,
साएबां  है  तो  सर  पे  साया  कर। 

सिर्फ़   चाहत  से  कुछ  नहीं  होता,
आसमां   सर  पे  मत उठाया कर। 

माना   दुनिया  ख़राब  है   लेकिन ,
मुझसे मिलकर तो मुस्कराया कर। 

आंधियां       आशियाँ      उजाड़ेंगी ,
तू   मगर   आशियाँ  बनाया   कर। 

ग़म के  मारों  की  आह  लगती   है ,
ग़म के मारों को  मत  सताया  कर। 

तेरी       बातें    अजीब    होती    हैं ,
मुझको बातों में मत  लगाया   कर। 
मनीष शुक्ला 



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