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Saturday, 17 June 2017



जुर्म   का    इन्किशाफ़  करना  है। 
अब     हमें    ऐतराफ़   करना   है। 

हमको   हर  पल   गुनाह  करने हैं ,
तुझको  हर  पल मुआफ़ करना है। 

एक   गिरदाब   की  तरह   हमको ,
ख़ुद का  कब तक तवाफ़ करना है। 

जंग  लड़नी  है  अपनी  हस्ती  से ,
ख़ुद को ख़ुद के ख़िलाफ़ करना है। 

हक़बयानी   से   काम    लेना   है ,
सारा  क़िस्सा  ही साफ़  करना है। 

मान  जाना  है  हमको आखिर में ,
बेसबब     इख़्तेलाफ़   करना   है। 

इन   चटानों  में  दर   खुले   कोई ,
इतना   गहरा  शिगाफ़  करना  है। 
मनीष शुक्ला 




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