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Sunday, 11 June 2017




घबराकर   अफ़लाक  की  दहशतगर्दी  से। 
हमने  ख़ुद   को  तोड़   दिया   बेदर्दी  से। 

हमने   ख़ुद   ये  हाल   बनाया  है  अपना ,
हमसे   बातें    मत    करिये   हमदर्दी  से। 

जब  ख़ुद को हर  तौर बयाबां  कर  डाला ,
तब  जाकर   बाज़   आये   दश्तनवर्दी  से। 

अब  भी  क्या  कुछ कहने की गुंजाईश  है ?
सब  कुछ  ज़ाहिर  है  चेहरे  की  ज़र्दी  से। 

तुम आकर कुछ वक़्त की गर्माहट भर दो ,
लम्हे    काँप   रहे    हैं    देखो   सर्दी   से। 

हम  इक  बार  भटक कर इतना भटके  हैं ,
अब   तक    डरते    हैं    आवारागर्दी    से। 

हम  भी  इश्क़  की  पगडण्डी  से गुज़रे  हैं ,
वाक़िफ़  हैं  पेच  ओ  ख़म  की  सरदर्दी से। 
मनीष शुक्ला 

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